ये कैसे बुझे मन की प्यास 
ये आग कैसे बुझेगी 
तू जब है सिर्फ मेरा 
  तो दर्द की लहर कैसे आई 
सुनो मैं तुमसे कुछ भी कहना नहीं चाहती न सुन्ना चाहती हूँ मैं सच में अब इतना थक गयी हूँ कि अब तुम्हारे साथ चलने का मन ही नहीं करता फिर भी खुद को घसीट सा रही हूँ तुम्हारे साथ कदम ताल मिलाते हुए चल रही हूँ निरंतर जिससे तुम्हारी चल में कोई रूकावट न आये क्योंकि तुम्हारी चाल थमी तो शायद मेरे मन को अच्छा नहीं लगेगा बल्कि बेहद दुःख का अहसास होगा जो मुझे कभी खुश नहीं रहने देगा वैसे देखा जाए तो मैं आज भी खुश नहीं हूँ इसका कारण मैं तुम्हे ही मानती हूँ तुम ही हो मेरे दुःखों का कारन ,हाँ हाँ तुम ही , तभी तो तुम्हारा ख्याल और तुम्हारी यादें पल भर को भी मेरा पीछा नहीं छोड़ती और मैं उन यादों में उलझ कर इतना तड़पती हूँ कि तुम्हें इसका अहसास तक नहीं होता और तुम जानबूझ कर मुझे दर्द घुटन और तकलीफ दे देते हो  ,पता है प्रिय जब तुम मुझे तकलीफ दर्द घुटन और कष्ट देते हो न तब तुम मुझसे भी ज्यादा तकलीफ में होते हो ,मुझसे भी ज्यादा दर्द झेलते हो , फिर क्यों होता है ऐसा या क्यों करते हो ऐसा ,बताओ प्रिय बोलो न सब सच ,सब हकीकत एक एक बात जो तुम्हारे दिल में है और जो तुम किसी से कह नहीं पाते हो ,इसलिए ही वे सब बातें मुझसे कहो ताकि हमारा मन हल्का रहे इतना भरा भरा न रहे और हम जीते जी मरे हुए के समान हो जाए ,,,तुम याद रखना कि जो बातें तुम्हें तकलीफ देती हैं वो मुझे और जो मुझे कष्ट देती हैं वो तुम्हें क्योंकि हम अलग नहीं हैं हम एक हैं ,हम एकदूसर से हैं और एकदूसरे के लिए बने हुए हैं फिर कैसी पर्दादारी, कैसी दुराव छिपाव की भावना ,,,,,
तुम मेरे हो और यूँ  ही मेरे रहोगे सदा 
लाख कर ले सितम यह दुनिया चाहें ,,,,,
सीमा असीम 
४,९,१९ 
 

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