b
कुछ लिखूँ मैं तुम्हें कि प्यार
का पैगाम भेज दूँ
शिकवा करूँ या प्रिय सिर्फ तेरा
नाम लिख दूँ ...
सुनो प्रिय
चाहत कि नदी में बार बार डुबती
हूँ तैर जाती हूँ पार लगकर भी उबर नहीं पाती हूँ और गहराई में उतर जाती हूँ ,,,,उन लम्हों को ख्यालों में जीते हुए कभी मुसकुराते
हुए तो कभी आँखों से नमी छलकाते हुए ...सनम तुम मुझसे दूर जाकर भी दूर कहाँ होते हो
बल्कि और भी ज्यादा करीब आ जाते हो ,ऐसे जैसे मेरी रूह के साथ
बांध जाते हो क्या तुमको पता भी है कि तुम खुद में बिलकुल नहीं बचे हो ,,मुझमें ही समा गए हो पूरी तरह से ,,,बस तुम स्वयं को
न जाने कैसे समझ पाते हो खुद से ही बिछुड़ कर या दूर होकर,,,
सनम जब तुम मेरे पास हो फिर मेरे
मन में यह कैसी बेचैनी घर कर लेती है ,,कैसी तड़पन ,,,कैसी तलब जाग जाती है कि तुम्हें अपने सीने
से चिपटा लेने को जी चाहता है ,,तुम्हें चूम लेने को जी चाहता
है ,,,तुम्हारी आँखों में एकटक देखते रहने को जी चाहता है और
तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर खो जाना चाहता है ,,,तुम्हारे चौड़े
से सीने पर टिकाकर अपना माथा तुम्हारी धड़कनों को सुनना चाहता है ,जिनसे निकलती रहती है मेरे ही नाम कि धुन ,,,प्रिय आओ
फिर खो जाये और गहरे में उतर जाएँ आओ हम प्यार को जीते हुए अमर हो जाएँ ....
तुम और तुम्हारे ख्वाब ही मेरे
जीवन का आसरा हैं
जागते हुए और सोते हुए भी ...
सीमा असीम
30,9,19
Comments
Post a Comment