इतने अरमान इतने ख्वाब और इतनी ख्वाहिशें थी मन में मेरे
पर अब मन भरा भरा लगता है मेरी आँखों की तरह। ..
सुनो प्रिय , क्यों हैं मेरी आँखों में आंसू इतने और क्यों हरदम मन परेशान रहता है न जाने क्यों मन कोई बात समझता ही नहीं है कुछ भी नहीं तुम्हारे लिए कुछ गलत सोचते हुए भी बहुत गलत लगता है क्यों दिल डूबा डूबा रहता है जैसे किसी अथाह सागर की गहराइयों में डूब गयी हूँ और वहां से बाहर आने का कोई रास्ता ही नहीं है लाख कोशिशों के बाद कोई सच्चा या पक्का किनारा ही नजर नहीं आता है हर तरफ झूठ गलत का मकड़ जाल की तरह उलझी और फंसी हुई न उबरने का रास्ता और न ही सुलझने का रास्ता , यार तुमसे तो कोई भी बात कहने का भी कोई मतलब नहीं कोई भी सवाल जो मैं तुमसे करुँगी वो मुझे मेरी नजरों में पहले गिरा देगा तुम तो क्या समझोगे इस सच्चाई को या फिर इस सच को जो तुम करते हो या करते आये हो वो तुम मुझसे कभी भी छिपा नहीं पाओगे भले ही पूरी दुनियां से छिपा लो कुछ भी कह कर उन्हें बहला लो बरगला लो लेकिन तुम मुझसे एक तिनका भर भी नहीं छिपा पाओगे क्योंकि तुम मेरी नस नस में बसे हो लहू बनकर दौड़ते हो और दिल में धड़कन की तरह धड़कते हो,, वैसे मेरा मुझमे कुछ है भी तो जो कुछ है तुम्हारा ही है फिर भला बताओ तुम कैसे कर पाते हो तुम मुझसे छल या दिखाबा या झूठ ,,,,,,खैर
अब तो यही समझ नहीं आता है कि मैं किस तरह से इस दुनिया पर विश्वास करूँ किस तरह से किसी को अपना मानूं और किस तरह से कोई रिश्ता बनाऊं। ....
डूब गयी हूँ मैं इतना इस झूठे छल भरे सागर में
कौन सच्चा आएगा कि सच की लाज बच जायेगी ,,,,
सीमा असीम
३,९,१९
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