ये मन की कैसी लगी है
न  जानी न समझी कभी
सुनो न प्रिय
                 तुम्हें सोचती हूँ तो भी मन भटक जाता है तुम्हे नहीं सोचती तब भी मन भटका रहता है आज भी पूरा दिन मैं बीएस तुम्हें सोच सोच कर परेशां होती रही कि तुम्हें मैं कभी समझ नहीं पाई और जितना समझने की कोशिश की उतना ही जयादा उलझती चली गयी जितना मैंने उबरने की कोशिश की उतना ही मैं और डूबती चली गयी सच में बहुत ही अजीब है यह रीत यह दुनिया की जिसमें सब अपने मन के होते हैं सबको सिर्फ अपनी ही परवाह होती है वो कभी किसी के बारे में जरा सा भी नहीं सोचता उसके बारे में भी नहीं जिसने अपनी जान की बाजी लगा दी अपनी सारी खुशियां लुटा दी खुद दर्द को अपने से लिपटा  लिया और किसी भंवर में फंस गयी जिसमें सिर्फ कांटे ही कांटे हैं जो हर पल चुभते है टीसते  और बेपनाह तकलीफ देते हैं लेकिन क्या करें अब यही जीवन में रह गया है ,,,दर्द सहते रहो और अपने मुंह को बंद रखो कुछ कहा तो बुरा होगा कुछ गलत हुआ या तुम्हें बुरा लगा तकलीफ हुई तो मेरी जान ही निकल जायेगी और अगर यूँ नहीं  तो मैं स्वयं अपनी जान निकाल दूंगी इस तरह से खुद को कष्ट दूंगी ,  एक बात  बताओ क्या मेरी तकलीफ का अहसास तुम्हें भी होता है जब मैं दर्द में तड़पती हूँ आंसू  तो क्या  तुम भी उस वक्त तकलीफ में यही होती है आ जाते हो तुम्हें भी वही कष्ट होता है जो मेरी आत्मा सह रही  होती है ,सीने को चीरती हुई मेरी तकलीफ जब तुम्हारे पास पहुँचती है तब तुम्हारी आत्मा भी दर्द से सिहर जाती होगी न ,अगर हाँ तो फिर तुमने मुझे  और तकलीफ में क्यों डाला क्या तुम्हें मेरी जरा सी भी परवाह नहीं है , जरा सा भी अहसास नहीं है बता दो मुझे ,क्योंकि अगर तुम हर बात को मुझसे सच कहोगे न तो मुझे भी तुम पर पूरा यकीं कायम हो जाएगा ,,,,,,प्रिय दुनिया बहुत बुरी है बहुत तकलीफ देती है तुम तो मेरे अपने हो न तो तुम मुझे क्यों दर्द तकलीफ और कष्ट देते हो बताओ न ,बताओ प्रिय ,,,
जीना है और यूँ ही जीते रहेंगे
दर्द को पीना है और यूँ ही पीते रहेंगे
एक दिन झिलमिलायेगी रौशनी से दुनिया मेरी
तब हम सझेंगे अभी भी सच और विश्वास जीवित है लोगों के दिनों ,,,
सीमा असीम
१,९,१९ 

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