तू याद यूँ भी न किया कर मुझे इतना कि मेरी हिचकियाँ मुझे चैन लेने न दें कर लिया कर बात पल दो पल बेवजह ही तू मुझे इतना न सताया कर देख आसमा में धुंध ही धुंध छाई है बारिश का कहीं नामोनिशां तक नहीं घुटन होती होगी तुम्हें भी कभी तो यह दिल तेरा दरिया सा क्यों नहीं रात भर करते हैं रक्षा जो हमारे देश की नमन उनको झुका कर सिर कर लिया करो जाँ की बाजी लगा देते हैं यह जांबाज इन्हें अपनी जान की फिक्र तक नहीं!!! सीमा असीम
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तुम्हारा जीना
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जब तुम मुझे याद करते होगे सिर पर हाथ रखकर रोते होगे या जाकर बैठ जाते होओगे बाहर रखे झूले पर और खामोशी से आसमा को देखते रहते होओगे कभी निहारते होओगे खिलती हुई कलियों को या कभी फूलों को देखकर मन में मुस्कुराते होओगे या प पीते के पेड़ से लिपटी उस नाजुक बेल को हाथों से छूकर कोमलता से सहला देते होओगे तभी आकर बैठ जाती होगी हरसिंगार के पेड़ पर एक गौरैया इधर उधर देखती हुई अपनी चोंच से कुछ तोडती हुई अपनी मध्यम सी आवाज में चाह्चाहा देती होगी तो उस वक्त टूट जाती होगी तुम्हारी तन्द्रा और तुम उस चिड़िया में देख लेते होगे अक्स जाकर उससे बात करने को उठते होगे लेकिन तब तक वो फुर्र से उड़ जाती होगी डर कर तुम्हारी आहट पाकर नहीं समझ पाती होगी तुम्हारे प्रेम पगे मन को हाँ मैं इस चिड़िया सी ही तो हूँ छोटी सी भोली सी और तुम्हारे मन की हर बात से अनजान तुम कभी कह क्यों नहीं देते आकर खोल कर रख क्यों नहीं देते अपने मन को म...
बारिश
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बारिश _______ अचानक से स्मृतियों के द्वार से अंधकार को चीरते हुए एक लौ की तरह आ जाओ तुम और नमी भरी मेरी आँखों पर रख दो अपनी गर्म हथेलियां.... बिना कहे ही मैं पहचान जाऊँ तुम्हें... कैसी हूँ मैं? तुम पूछ भी न सको और मैं बता भी न पाऊँ तुम्हारे असीम प्रेम से ओतप्रोत हो मैं निखर जाऊँ जी उठूँ एक बार पुनः जैसे सावन की बारिश से हरिया जाते हैं सूखते मुरझाते पेड़ पौधों भी .... खिल जाएं गुलाब चँपा महक जाये जब कभी मेरा मन घबराता था ज्येष्ठ की तपती गर्मी सताती थी तब मेरा माथा महसूसता था तुम्हारे अंकित किये गये स्पर्श को या हल्की सी खटक भी अहसास कराती थी तुम्हारे आने का.... पर यह क्या है कि तुम आये तो ले आये अपने संग संग बारिशें भी आँखों में भी और आंगन में भी खुशी की खुशहाली की.... सीमा असीम, बरेली
नदी झरने
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मुझे बहुत प्यार है इन सूरज चांद सितारों पहाड़ नदी झरने फूल पेड़ पौधे हवा से क्योंकि यह हमें खुशी देते हैं मन को प्रफुल्लित करते हैं बिना किसी शर्त बिना किसी माँग के.. यह सब हमें असीम सुख से आह्लादित करते हैं कुछ भी तो नहीं चाहते हमसे बस देते ही रहते हैं ... जब तक कि यह मोहक रूप में होते हैं तब तक हम सुखी होते हैं खुश होते हैं पर कभी जरा सा विकराल रूप दिखाते हैं तो हम सब डर जाते हैं घबरा जाते हैं ... जैसे कि सूरज अपने तेज ताप से हमें तड़पाता है या जब तेज हवाएं अंधियाँ आती हैं या जब बारिश भयंकर रूप में आती है तो फिर कहाँ हमारे मन को लुभाती है... हम सहज और सरल मानव हैं और सहजता सरलता ही प्यारी लगती है प्रकृति की किसी भी रूप में भयंकरता या विकरालता स्वीकार नहीं कि हम अथाह प्यार करते हैं प्रकृति से इसके हर रूप से .. असीम
पहाड़ aur मैं
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पहाड़ पर फैली हरियाली को यूँ ही खामोशी से एकटक निहारने का मन था आगंतुकों को पुकारती देवदार की फैली भुजाओं को एकाग्रता से देखने का मन था पर न जाने कहाँ से आ गये आवारा से नीर भरे बादल और ढक दिया अपने गीलेपन से कर दिया सब पानी पानी न रही चमक न रही रोशनी धुंधला गया सबकुछ पेड़ों पर कोई पंक्षी की पुकार नहीं रिमझिम बारिश से भीगी सड़कों पर कोई चहल कदमी नहीं बस आती जाती गाड़ियों में दुबक कर बैठे लोग घर पहुँचने की जल्दी में छतरी लिए लोग लपक के शेड की ओट लेते हुए फिर भी प्यारा लगा यह अनदेखा रूप जब पानी ही पानी था हर ओर फिसलती हुई ट्रेन से या कार के शीशे से दिखाई देते हुए झरना, नदी और बादल सब लबालब भरे भरे से जैसे कहना चाहते हो इस रूप मे अपने सारे दुख दर्द को.... Seema Aseem Saxena