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पहाड़

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 पहाड़ बड़े कोमल होते हैं  इन से बहती है प्रेम धाराएं   ग्लेशियर के रूप में दूर से लगते हैं  निष्ठुर कठोर  करीब से जाकर देखो   तो समझ आते हैं बडे  गुणकारी होते हैं  फूल फल और औषधियों से भरे  यह हरे भरे पहाड़  उन्नत मस्तिष्क उठाए खड़े हुए   अटल अडिग मेरे प्रिय पहाड़...  सीमा असीम 

प्रेम में

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  वे  दोनों में  प्रेम थे  पर कहते नहीं थे कभी  वे कभी  फूल भेजते  और कभी उपहार  नए नये  नाम रचते एक दूसरे का  वे  याद करते और बातें भी करते  वे बार बार साथ चलने को आतुर होते  एक दूसरे की बाहों में बाहें डाल कर   दिन गुजरते जाते आस बढ़ती जाती  यूं ही दिन बीतते रहे  वे खुद से ही हँसते मुस्कुराते बतियाते   बारिश में भीगते  फूलों संग महकते  ओस सा नम होते  किसी पेड़ के तले बैठे रहते  घंटों यूं ही सोचते हुए कि  उन्हें इतना यकीन था  वे मिलेंगे  बार बार मिलेंगे  मिलते रहेंगे  सदियों तक  फिर फिर बिछुड्ने को  क्योंकि वे प्रेम में थे  अद्भुत अनोखे सच्चे प्रेम में ...... सीमा असीम  29,9,20 

चाँद

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 कितना करीब लगता है कभी यह चाँद   इतना करीब कि हाथ बढ़ाओ और छू लो  बिठा लो अपने पास में  कर लो मन की ढेर सारी बातें  कुछ कह लो,  कुछ सुन लो और यही चाँद कभी-कभी कितना दूर लगने लगता है  न जाने क्यों इतना दूर दूर सा  कि उसे हम कुछ कह नहीं सकते  उसे हम कुछ बोल नहीं सकते  उसे हम कुछ सुना नहीं सकते और  हम उससे कुछ सुन भी नहीं सकते  न जाने क्यों वह हमें इतना दूर लगता है?    यह चाँद ज़ब मुस्कुराता है तो कितना प्यारा लगता है  चारों तरफ बिखर जाती है एक उज्जवल आभा  हर तरफ से आने लगती है रोशनी  मन में चमक और खुशी जैसा माहौल पैदा हो जाता है  ज़ब गुस्सा करता है चाँद तो   घिर आते हैं पानी भरे बादल  कालिमा छा जाती है  हर ओर अंधेरा हो जाता हैं  तब उसकी आंखों में कोई पवित्रता नहीं होती है  ऐसा चांद अच्छा नहीं लगता है ना  अच्छा लगता है वो सिर्फ हंसते मुस्कुराते गाते  बतियाते हुए  कुछ कहते हुए और कुछ सुनते सुनाते  हुए....   सीमा असीम

पीहू हमारी

   दौड़ी-दौड़ी फिरती है  पल भर नहीं ठहरती है  कभी पहनती लहंगा चुनरी  कभी फ्रॉक पहनती है  नाना नानी की बेटी रानी   दादा दादी की राज दुलारी   मम्मी पापा जान छिड़कते   घर भर को वह लगती प्यारी  इतनी सुंदर छोटी छोटी आंखें  ख्वाब चमकते उसमें रहते   होठों पर  लाली प्यारी   बातों से लगती है वह कितनी प्यारी कितनी भोली   खाने में बड़े नखरे करती खाना नहीं वो खाती  दूध को तो वह ना हाथ लगाती   चॉकलेट टॉफी लाइम जूस जेम्स पर फिसलती  कितना मनाओ कितना वहलाओ पर वह कभी किसी की बातों में ना आती  अभी तो बहुत छोटी है  1 दिन बड़ी बनेगी  पूरी दुनिया में नाम रोशन करेगी  सब को बहुत खुशी देगी  उससे प्यारी कोई नहीं है  सबसे प्यारी पीहू हमारी  सबसे न्यारी पीहू हमारी  सबसे सुंदर सबसे प्यारी  पीहु  हमारी  पीहू हमारी  आज बेटी डे पर बेटियों के लिए प्रस्तुत है कविता

वो

पंछी

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   चहचहाते हुए पंछी अँधेरे से ही निकल पड़ते हैं  अपने  हौसलों से  अपने घोंसलों से  बेफिक्र होकर ऊँची  उड़ान भरते हुए  वे न किसी डर से ग्रसित हैं  ना किसी भय से  उन्हें नहीं पता कि महामारी कहां फैली है  वे स्वतंत्र है  वे आजाद है  खुली हवा में सांस ले रहे हैं  उन्हें जरूरत नहीं है किसी मास्क की   सैनिटाइजर की  फेस कवर की  वे तो बस अपने हौसलों के साथ उड़ रहे हैं  उची उची उड़ानों से   छू रहे हैं नभ को और  आकाश को...... सीमा असीम 

आस

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  मैं खुश हूँ बहुत खुश कल से ही  फिर क्यों रात को आँसू बहने लगे  प्रेम के रंग अजब हैं  सुख में आँसू  दुख में आँसू  प्रेम का सच्चा साथी है दुख  प्रेम में कभी कहाँ मिला है सुख  फिर एक आस मन में पल गयी है कि  दुख अब सुख में बदलेंगे  संग संग कुछ दूर चलेंगे  चिड़ियों सा मन चहक पड़ेगा  जीवन में  जीवन जीने को मिलेगा  मन का उपवन महक उठेगा  पत्तों पत्तों और डाली डाली पर  सुंदर सा पंछी डोलेगा  मीठे फलों का स्वाद चखेगा  उसका मन कितना खुश होगा  सोच सोच कर मन मुसकाया  आँखों के कोरों पर सुंदर सुखद स्वप्न सजेगा  महक उठेगा  खुशियों के पल में  सारा तन और सारा मन ....... सीमा असीम  15, 9, 20  ,