कहना तो बहुत कुछ है तुमसे पर कैसे कहें तुम ही कहो ॥ सुनो प्रिय शायद तुम सब जानते हो समझते हो लेकिन मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं है न तुम्हारे पास तभी तुम खामोश हो जाते हो ,,पर सुनो खामोश रहना किसी भी बात का इलाज नहीं है और न ही सही तरीका है क्योंकि जब तुम मेरे हो सिर्फ मेरे तो फिर तुम किसी और के कैसे हो सकते हो और किसी और को गले कैसे लगा सकते हो ? बोलो बताओ ? क्या यही होता है विश्वास और आस्था का परिणाम कि तुम एक झटके में उस को तोड़ दो और खुद को सही साबित करने के लिए लगातार तोड़ते ही चले जाओ ,,इतने टुकड़े करो कि हर टुकड़े से तुम्हारा अक्स दिखने लगे ,,, सच में आज इंसान के अंदर इंसानियत बची ही नहीं है न उसके अंदर कोई भावना ,,,वो जीते जी भी मारे हुए के समान हो गया है ,,, तभी तो तुम मुझे दुख देते रहे एक शख्स जिसने तुम पर अपना तन मन और धन लूटा दिया उसे सिर्फ लूटते ही रहे कभी यह ख्याल भी नहीं आया तुम्हारे मन में कि यह भी एक इंसान है लेकिन नहीं तुम्हें तो उसे जीतना था और उसे जीतने की खातिर गिरते गए और इतना गिरे हो कि तुम खुद से भी नजर नहीं मिला पाते होग...
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मुझे अब कुछ और दीवाना कर दे कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं सच कहूँ तो दिल इतना उदास और परेशान है कि समझ ही नहीं आता है क्या करू ? क्या लिखूँ और क्या कहूँ ? मैं सब भूल गयी सच झूठ से परे हो गयी ,,, नहीं याद मुझे कि मैं तुम्हें जानती भी हूँ , पहचानती भी हूँ कि तुम वो नहीं हो जो तुम थे अब कोई और है कोई अलग सा व्यक्ति ,,, तुम एक इंसान ही रहते वो भी सही था लेकिन तुम इंसान नहीं बल्कि एक व्यक्ति बन गए कोई आम व्यक्ति ,,, जिसे मैं जानती थी , पहचानती और समझती थी वो कहीं मिट गया है ,,, असाधारण, अपरिमित, अनोखा और जादुई व्यक्तित्व वाला वो इंसान ...जिसे मेरे प्रेम ने हीरे की तरह चमका दिया था ,,, क्योंकि तराशा इतना कि हर कोना जगमगा उठा था ,,, फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि उसकी चमक धूमिल सी होने लगी धुंधलाने लगा अक्स ,,, मानों किसी ने उस पर मिट्टी उड़ेल दी हो किसी ने उसकी चमक को चुरा लिया हो ।,,, अचंभित हूँ सच में बहुत ही दुखी और तकलीफ में भी कि आखिर ऐसा क्यों कर हुआ ,,,, सनम तुझे याद कर कर के रोये बहुत हैं कि दम घुटने लगा है तुझे सोचती हूँ तो ... सीमा असीम 27,4,20 ...
कबीर
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जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही । सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।। जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब : प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।अर्थ
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रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय । हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥ कबीर दास जी कहते हैं कि हमें इतना सुंदर मानव जीवन मिला है इससे कीमती दुनिया में कुछ हो ही नहीं सकता है लेकिन हम समझ ही नहीं पाते और अपने बहुमूल्य जीवन को रात में सोते हुए दिन में खाते हुए बिता देते हैं और हीरे से अमूल्य जीवन को बेकार की कामनाओं और वासनाओं में लिप्त होकर खत्म कर देते हैं इससे दुखद क्या हो सकता है ... सीमा असीम 16,4,20
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ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस। भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस। कबीर जी कहते हैं कि जब किसी अज्ञानी मूर्ख या कम अक्ल इंसान को देखता हूँ तो मन को बहुत दुख होता है , बेहद कष्ट कि इस संसार रूपी सागर में कोई भी ऐसा व्यक्ति या इंसान नहीं है जो सही बात बताकर और भरम से निकालने वाला कोई तो हो जो इस भाव सागर से बालों से पकड़ कर खींच ले और मोह माया में डूबने से बचा ले ,,, सीमा असीम 14,4,20
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लिखती हूँ तेरा नाम उसे और गहरा कर उकेरती जाती हूँ अपने दिल से आत्मा तक ले जाती हूँ तुम करते रहना दिमाग की बातें प्रेम को परे कर के मैं तो अपने दिल को और भी सच्चा करके रिश्ता निभाये जाती हूँ क्यों दूँ मैं तुम्हें कोई दोष हो सकता है यही तुम्हारे संस्कार हो गलत करना और उसे ही सही कहना लेकिन मैं सही को कभी गलत क्यों कहूँ मैं जो है सच उसे ही क्यों न सच कहूँ मैं अपने संस्कार अब कभी नहीं छोड़ूँगी बहुत हुआ अब मैं सिर्फ अपने मन की ही करूंगी अपने मन की सुनुंगी क्यों कहूँ मैं तुम्हारे मन की बातें तुम ही कहो न जो चाहे मन तुम्हारा करो करते रहो एक दिन हार थक कर बैठ जाओगे फिर देखना कितना पछताओगे रोओगे सिर पकड़ कर अपना एक बेगुनाह को जो इतना सताओगे मैं कहाँ कहती हूँ तुम्हें कभी कुछ ओ मेरे सनम मेरे दिल की आहें और आँखों की नमी जो खुद ही आ जाती हैं उनका कोई इलाज है तुम्हारे पास बोलो बोलो न ... सीमा असीम 13,4, 20
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सुनो प्रेम करती हूँ न तुमसे बस इसलिए ही अपना तन मन धन सब समर्पित किए रहती हूँ और करती रहती हूँ तुम्हारा इंतजार सिर्फ तुम्हारा इंतजार कैसे मन में हुक उठती है कैसे मन को समझाती हूँ कैसे अपने अशकों को बहलाती हूँ मनाती हूँ और कैसे अपने मन को हर समय एकाग्र किए रहती हूँ कभी सोचा है तुमने कभी ख्याल आया है तुम्हें कैसे अपने दर्द को छुपा लेती हूँ कैसे तुम्हें मुस्कान दे देती हूँ काभी सोचना प्रिय काभी समझना प्रिय कि तुम बिन यह जीवन निस्सार है कि बात में हो तुम ही सबसे पहले और सब बाद में खुदा से पहले ही नाम लेती हूँ तुम्हारा सब कुछ भुला कर तुम्हें जपती रहती हूँ हमेशा मेरे प्रिय ध्यान देना काभी काभी तो ख्याल करना मेरे सपनों में तुम मेरे ख्यालों में तुम कि तुम बिन कुछ नहीं कुछ भी नहीं सीमा असीम 12, 4, 20