नया साल मुबारक हो मुबारक हो नया साल मन में खुशहाली हो होठों पर लाली हो दिल में दुआएं हो फूलों की छाँव हो है यह सपना लगे जग अपना छोटी सी चाहत है न कोई कभी आहत हो नदिया सी बहती जाऊँ खुशियाँ पिरोती जाऊँ पर्वतो की चोटियाँ पर बादलों की रंगरलियाँ हो चाँद रोज आकर बतियाये बच्चों सी मस्ती की जाये माँ के साथ कुछ पल बैठजाऊँ पंख लगाकर दुनिया घूम आऊँ इंद्र्धनुष देख झूम झूम जाऊँ फूलों को देख खूब मुस्कुराऊँ तितलियों के रंग कितने प्यारे प्यारे मन में भर जाये सारे हवा के संग दौड़ लगाकर दूर गगन में चमकते सूर्य को मुट्ठी में भर लाऊं भरी रहे आँखों में नमी और जीवन को जी भर जी जाऊँ मुबारक हो नए साल में खुशियाँ तुम्हें और हमें भी ,,,, सीमा असीम 1,12,20
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तुम हो तो सिर्फ मेरे कितने सारे अनुभव कितनी सारी स्मृतियाँ मन में उमड़ती घुमड़ती रहती हैं मैं तुम्हें याद नहीं करती पर रहते हो हर वक्त यादों में मैं सुनती नहीं अपनी धड़कनें फिर भी कहती रहती हैं तुम्हें ही डर जाती हूँ अक्सर इतनी हिम्मत होते हुए भी बिखर जाती हूँ मैं भटकती नहीं हूँ कभी रोते रोते धुंधला जाता है सब कुछ और हो जाती हूँ इतनी पाक साफ कि लगता ही नहीं कि मेरा शरीर भी बचा है सिर्फ आत्मा रह गयी है जो प्रेम से सराबोर है रंग में रंगी हुई है किसी आनंद के सागर में गोते लगा रही है सारे दुख सारे कष्ट कहीं खो गए हैं सिर्फ बचा है तो सुख खुशी और मुस्कान हाँ प्रिय यही तो सच है मेरा और रहेगा हमेशा जन्म जन्मांतर तक सीमा असीम 30 12 19
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कोई चाह नहीं है लेकिन बेइंतिहाँ चाहत है मन में सिर्फ तुम्हारे लिए और सिर्फ तुम ही हो क्या कहना है और क्या कहना चाहती हूँ शायद तुम समझ जाते हो बस इसीलिए ही मैं तुमसे कुछ भी कहना नहीं चाहती ,,पर सच कहुंतों सच सिर्फ यह है कि मेरी आँसू बहने शुरू हो जाते हैं और मेरा जिस्म बेजान हो जाता है ,,ना जाने कहाँ चली जाती है मेरे शरीर की जान , सनम क्या कहूँ मैं ,,क्या तुम सच में समझ जाते हो न ,, पता है न तुमको कि जबसे मांगा है सिर्फ तुम्हें ही मांगा है और कोई मांग नहीं है मन में ,,,जबसे चाहा है सिर्फ तुम्हें ही चाहा है ,, बस एक ही ख़्वाहिश है और कोई ख़्वाहिश नहीं है मेरी ॥ इतने शब्द मेरे मन में समा गए हैं लेकिन मैं निशब्द हो गयी हूँ कुछ कहने को जुबां खामोश हो गयी है और आँखों में इतनी मनी भर गयी है कि बस जरा सा दिल भरा और अश्क छलक जाते हैं बस मैं नहीं जानती ऐसा क्यों है पर यही सच है सिर्फ यही सच है कि तुम सिर्फ मेरे हो सिर्फ मेरे ,,,,, तुम्हें किस भाषा में कहूँ कि हर भाषा मौन हुई है तुम मौन को मेरी कोई भाषा दे दो कोई जुबां दे दो ,,, सीमा असीम 29 , 12, 19
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|| ख़ुदा से सवाल || मेरे ख़ुदा ! यह क्या वशीभूत कर लेता है हमें प्यार में ? क्या घटता है हमारे भीतर बहुत गहरे ? और टूट जाती है भीतर कौन सी चीज भला ? कैसे वापस पहुँच जाते हैं हम बचपन में जब करते होते हैं प्यार ? एक बूँद केवल कैसे बन जाती है समंदर और लम्बे हो जाते हैं पेड़ ताड़ के और मीठा हो जाता है समंदर का पानी आखिर कैसे सूरज हो जाता है कीमती कंगन एक हीरे का जब प्यार करते हैं हम ? मेरे ख़ुदा : जब प्यार होता है अचानक कौन सी चीज छोड़ देते हैं हम ? पैदा होता है क्या हमारे भीतर ? कमसिन बच्चों से क्यों हो जाते हैं हम भोले और मासूम ? और ऐसा क्यों होता है कि जब हंसता है हमारा महबूब दुनिया बरसाती है यास्मीन हम पर क्यों होता है ऐसा कि जब रोती है वह सर रखके हमारे घुटनों पर उदास चिड़िया सी हो उठती है दुनिया सारी ? मेरे ख़ुदा : क्या कहा जाता है इस प्यार को जिसने सदियों से मारा है लोगों को, जीता है किलों को ताकतवर को किया है विवश और पिघलाया किया है निरीह और भोले को ? कैसे जुल्फें अपनी महबूबा की बिस्तर बन जाती हैं सोने का और होंठ उसके मदिरा और अंगूर ? कैसे हम चलते हैं आग में और मजे ...
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गर जले जब मन में कभी आग तो न रहे मन में जरा सी भी ईर्ष्य, द्वेष, और स्वार्थ हो जाए सब भस्म जल कर उसी आग में ,,,,, हाँ यही तो होता है न ,,,जब मेरा मन जलने लगता है प्रेम की आग में तब उसकी लपटें इतनी तेज होती हैं कि जल जाता है सब कुछ और बचा रह जाता है सिर्फ प्रेम , क्योंकि प्रेम कोई वस्तु नहीं है न कोई आँसू या खुशी है बल्कि शाश्वत सत्य है जो सब कुछ जला कर खुद और भी ज्यादा निखर जाता है , ताप कर और पवित्र हो जाता है ... प्रेम एक ऐसी भावना है जिसे देखना चाहो तो जग रोशन कर दे और आँखें बंद करो तो मन रोशन कर देता है ,,,, सही बात तो यह है कि जब मन खुश होता है तब पूरी दुनिया बेहद प्यारी और खूबसूरत नजर आती है न , कहा भी तो गया है कि यह सारी दुनिया मन की है जैसा चाहो वैसा पालो ,,,इसीलिए मैं कहती हूँ कि तुम मेरे ही हो और मैं तुमसे ही हूँ ,यह जीवन उस दिन तक ही इतना प्यारा है जब तक हम हैं तुम हो और है हमारा प्रेम ..... क्या कहूँ या कैसे कहूँ शब्द कम हैं और बहुत ज्यादा है हमारा प्रेम ,,,,,, सीमा असीम 26,12,19
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तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है अँधेरों में भी मिल गयी रोशनी है तुम हो तो क्या गम है, बस यही एक बात मेरे मन को तसल्ली देती है कि जब तुम मेरे साथ न होकर भी मेरे साथ हो तो फिर साथ होकर कितने ज्यादा करीब होते हो ... आज मन में सुबह से ही पुलक घर कर गयी थी मन खुशी से झूम रहा था कि जैसे किसी नयी खुशी ने मन में बसेरा कर लिया हो मेरा नाराज और उदास मन बिना किसी के मनाए जाने के बाद भी मान गया था , फिर मन मन मरजी का गीत, नाचना और सर्द कोहरे भरे दिन में सूरज का चमकना ,, सब कुछ कितना सरल और सुखद था , न कोई उदासी , न रोना , मानों सेंटा खुशियों का खजाना लेकर आया है सारे दुख दूर करके खुशी और सुख का संदेश ले आया है , मेरा पवित्र निर्मल मन कुछ और ज्यादा साफ और खुश हो गया है ,,, सच में सच के जीत है और झूठ के आगे हार आखिर कब तक हम सच झूठ जीत हार का जश्न मानते रहेंगे , नहीं जानती लेकिन एक बात पक्की है कि सच कभी टूटता नहीं हारता भी नहीं हाँ कुछ समय को विचलित हो जाता है, बिखर जाता है फिर उसका वही विचलन, बिखराव उसमें और भी ज्यादा चमक भर देते हैं , हैं न प्रिय तुम कहो न , कुछ बोलो कि सच हमेशा सच ...
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मैंने तो साथ मांग लिया है तुम्हारा अब कभी कहीं मैं अकेली नहीं होती हाँ मैं यही तो कहना चाहती हूँ मैं कि तुम हमेशा मेरे साथ होते हो जहां मैं वहाँ तुम और जहां तुम वहाँ मैं कभी कहीं भी तुम्हें याद करने या पुकारने की जरूरत ही नहीं होती ! याद है न तुम्हें तुम ही तो कहते हो न कि साथ होने से हम साथ हो यह जरूरी नहीं है बल्कि हम तो हमेशा साथ है दूर रहकर भी , हैं न , सुनो अब की बार जब तुम आना न तो कोई ऐसी निशानी दे जाना जिसे मैं हमेशा अपने पास रख सकूँ और जब जी चाहें उसे सहेजूँ , जब जी चाहें उसे निहार लूँ कि कहाँ जरूरत होगी फिर तुम्हारे होने की ,,, हैं न ,,, लेकिन क्या तुम नहीं चाहते कि हम साथ हो ,, हाथों में हाथ हों ,, दिन हो या रात हो सिर्फ प्यार की बात हो कि यह प्रेम ही बचा सकता है दुनिया को और जब है तो और कुछ माने नहीं रखता॥ प्रेम के आगे सब हार जाओ फिर भी कम है ,,प्रेम में कुछ बचता ही कब है ,,, कुछ भी नहीं सब मिट जाता है जलकर भस्म हो जाता है ,,, अहम ,,झूठ ,, दगा ,, छल ,,सब कुछ खत्म ,,बस बचा रहता है प्रेम और यही प्रेम हार कर भी नहीं हारता ,हर दफा जीत जाता है ,,कि पवित्र मन और सच के आग...