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 गतांक से आगे  रिया  तू मुस्करा जब न कुछ लिखने का मन करता है, न कुछ पढ़ने का, न कहने का, न ही कुछ सुनने का ॥तब मैं बातें करती हूँ इन हवाओ से, फिज़ाओं से, किसी दरख्त के नीचे खड़े होकर उसके लहलहाते हुए एक एक पत्ते से ......सूर्य के उगने से पहले ही लगा देती हूँ सारे पौधों को पानी ,न जाने क्या गुन गुन बोलते हुए ....हवाएँ सुन लेती हैं वो गाना जो मैंने मन ही मन बुदबुदाते हुए कहा था .....ओ दिव्य पुरुष तुमने खुद को कैसे समझ लिया इतना मामूली .....क्या तुम नहीं जानते, नहीं समझते तुम प्रेम हो मेरा ...वो क्षितिज जहां का कण कण प्रतीक है मेरे प्रेम अश्रुयों का , जो बिना किसी बाधा के चूमते रहते हैं मेरे अंगों को ...कैसे बांध दोगे प्रिय मेरे प्रेम को तुम बंधनों में....मैं खुलकर इजहार करना चाहती हूँ ... वो गीत गुनगुनाना चाहती हूँ जो मैंने लिखे हैं प्रेम में डूबकर, वो नाम ज़ोर ज़ोर से पुकारना चाहती हूँ जो मैं मन में किसी मनका की तरह पल पल लेती हूँ ...प्रिय सुनो, मैं तुम्हें सिर्फ तुम्हें ही तो प्यार करना चाहती हूँ .....क्या मार दोगे मेरा प्रेम ...पिलाकर जहर या घोट दोगे गला दबाकर इन बंद...
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गतांक से आगे  रिया तू मुस्करा ऐसा होता है तो क्यों होता है ? पर ऐसा ही होता है .....सुबह से कितनी ही बार फोन उठाया था फिर रख दिया था, बस दो बातें करनी थी, कर लूँ, कह दूँ ...सुन लूँ शायद समझ जाये मन,, सुलझ जाये उलझन, भर जाए मन में ऊर्जा ...हो जाये प्रफुल्लित तन मन लेकिन कर ही नहीं पायी कोई बात, ना जाने कैसी शिकायत है जो आकर बैठ गयी है दिल पर ....जिसने सी दिये हैं लब !,,,इसके बाद भी एक उम्मीद जब भी बजती सुरीली धुन बिखेरती हुई फोन की घंटी ...कहीं तुम्हारा तो नहीं ....कितनी ही बार बजा था फोन और हर बार यही तमन्ना .... अचानक से फिर बजा फोन कहीं तुम्हारा तो नहीं .....अचंभित .....हाँ ये तो तुम ही हो ........बुझते हुए चरागों में मानों तेल बढ़ा दिया हो ......मुस्करा दिये थे खामोश लब और नूर सा बरस पड़ा ......भावनाओं का ....जज़्बातों का ...पूरा संसार ही ....इद्र्धनुषी रंग भर कर बिखर गया मेरे आसपास ....  सुनो प्रिय, मैं प्रेम करती हूँ तुमसे .....हाँ मैं प्रेम में हूँ तुम्हारे ....विशाल सागर सा हरहराता प्रेम, मेरे मन में ठाठें मारता हुआ रचने लगा है अनोखा आकाश .... होता है हाँ हमेशा...
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नज़्म ओ सनम तेरा शुक्रिया  जो मुझे दर्दे ए दिल पहलू में दिया  कर के चाक चाक  खून ए जिगर  तुझे खुशियों का उपहार दिया सजा दिये फूल तेरी राहों  में काँटों सेअपना दामन भर लिया  दुनियाँ की रोशनियाँ मुबारक तुम्हें  तन्हाइयों से रिश्ता जोड़ लिया  तुम रहो यूं ही सदा खुशहाल  मैंने तो खामोशीयों को ओढ़ लिया  वफ़ा की राह पर कर दूँ निसार  दिल को दरिया ए दिल बना लिया !! सीमा असीम
खूबसूरत है जीवन आओ सजन प्यार से सजा लें कभी तुम मुस्कराओ कभी हम खिलखिला ले हर अंदाज तेरा मेरे मन को प्यारा लगे आज देखा जो मैंने आईना हम सवरे लगे हर बात पढ़ लेता है दिल हर पन्ने का लिखा नजरों से जो न पढ़ा मेरे मन ने पढ़ लिया !! सीमा असीम
क्या जानु साजन होती है क्या गम की शाम  जल उठे सौ दिये जब लिया तेरा नाम  काँटों पे मैं खड़ी नैनों के द्वार पे  निश दिन बहार के देखूँ सपने  चेहरे की धूल क्या चंदा की चाँदनी  उतरी तो रह गई मुख पे अपने    जब से मिली नजर  माथे पे बन गयी बिंदिया तेरे नयन  देखो सजना  धर ली जो प्यार से मेरी कलाइयाँ  पिया तेरी उँगलियाँ हो गयी कंगना    .
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रिया तू मुस्करा सुबह से रात हो गयी और रात गहराती चली गयी ! मैं इंतजार करती रही .... पलकों से उस राह को बुहारती रही... बिना पलक झपकाए निहार ती रही ... और बहता रहा मेरी  दायीं आँख से आँसू.... न जाने क्यों ? किसलिए बेचैन रहा मेरा मन ,,,,,,,गुजार दी सारी रात यूं ही .....तेजी से धड़कता दिल और तेज धड़कता रहा मानों सीने से निकल कर बाहर आ जाएगा ....मुझे सच में नहीं पता ऐसा क्यों हो रहा है ? पर हो रहा रहा है मेरे प्रिय आ जाओ और प्रेम के दो शब्द भर ही कह दो मेरे मन को शायद कुछ सांत्वना मिल जाये .......देखो दोपहर हो गयी है सूरज सर से गुजर कर ढलने लगा है .....फिर शाम हो जाएगी और गहरा जाएगी रात ...सुनो प्रिय .....   अरे यह क्या तुम हो ? तुम मुझसे बात कर रहे हो ? मेरे मन को खुशियों से भरने को उदास हो रहे हो ? तुम्हें उदास नहीं होना है ! मैं तो तुम्हारे होठों पर वही प्यारी मुस्कान देखना चाहती हूँ ....तुम बहुत प्यारे लगते हो मुस्कराते हुए ....मैंने कहा था न कि प्रेम सदा भारी होता है ! इसमें सच झूठ, अपना पराया, तेरा मेरा कुछ नहीं होता ......अगर सिर्फ मैं ही प्रेम करूंगी तो बस वो भी...
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रिया तू मुस्करा वो अहसास हरदम साँसों में घुले रहते हैं जो तुम पल भर को मुझे दे देते हो ....लेकिन जब जरा सा भी दूरी का एहसास होता है तो मैं घबरा जाती हूँ, मेरा दिल तेजी से धडक उठता है और गले में कुछ अटका अटका सा रहता है .... ऐसा लग रहा है जैसे जिस्म से जान निकली जा रही है ....नींद न जाने कहाँ गायब हो जाती है... पलक झपकती ही नहीं ...जिन रस्तों से हम गुजरे उन रस्तों पर देखो जाकर सिर्फ फूल ही फूल हैं ...मैंने तो तुम्हारी राह में हमेशा फूल ही बिछाए फिर यह कांटे मेरे दमन में कैसे भर दिये ,,,,,बहुत चुभते हैं ...मुझे इस चुभन से बचा लो ,,,प्लीज मुझे जीना है ,,,मैं जीना चाहती हूँ ,,,हँसना ...खिलखिलाना चाहती हूँ ...यह कैसी अगन है ? यह कैसी तपन है ?.मेरे प्रिय मुझे निकालो इस उलझन से ....मेरा दम घुट रहा है ....मानों साँसे थम रही हैं .....खोजती रही हूँ तुम्हें ही पूरा दिन......आज मेरे मन का पंछी बहुत ज्यादा बेचैन है................मत दो मुझे इतनी सजा............ न जाने क्यों तुमने मुझे यह सज़ा दी ....पता नहीं कौन सी वो गलती की जो मैं अकेले ही इस सज़ा को भुगत रही हूँ .......तुम सच बताना क्या ...