नेह नेह की डोर से बंधी खिंची चली आती हूँ बार बार उसी राह पर चलती चली जाती हूँ बिन परवाह किसी परवाह के सावन का मेघ बन बरस बरस जाती हूँ आँगन की तुलसी पर ओस बन टपक जाती हूँ तेरे बाग में आम के पेड़ पर चिड़िया बन चह्चहाती हूँ समुंद्र के किनारे सीपों में गिर जाती हूँ एक सफ़ेद चमकती मोती बन जाती हूँ तेरे कुरते का बटन बन सीने पर सज जाती हूँ मदिरा की बोतल में बर्फ का टुकड़ा बन पिघलती हूँ पी लेते हो शराब समझ कर मै मिट जाती हूँ तुम्हें आबाद कर जाती हूँ आबाद कर जाती हूँ नेह के नाम पर बार बार मिटती जाती हूँ बार बार मर जाती हूँ !! सीमा असीम !!