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नेह नेह की डोर से बंधी खिंची चली आती हूँ बार बार उसी राह पर चलती चली जाती हूँ बिन परवाह किसी परवाह के  सावन का मेघ बन बरस बरस जाती हूँ आँगन की तुलसी पर ओस बन टपक जाती हूँ तेरे बाग में आम के पेड़ पर चिड़िया बन चह्चहाती हूँ समुंद्र के किनारे सीपों में गिर जाती हूँ एक सफ़ेद चमकती मोती बन जाती हूँ तेरे कुरते का बटन बन सीने पर सज जाती हूँ मदिरा की बोतल में बर्फ का टुकड़ा बन पिघलती हूँ पी लेते हो शराब समझ कर मै मिट जाती हूँ तुम्हें आबाद  कर जाती हूँ आबाद  कर जाती हूँ नेह के नाम पर बार बार मिटती जाती हूँ बार बार मर जाती हूँ !! सीमा असीम  !!
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मेरे पास हो तुम सदा  तुम आ गए प्रिय इस तरह से यूं वक्त बेवक्त जो तुम आ जाते हो तो तुम्हारे आते ही आधी रात को अंधेरे में भी सूर्य के प्रकाश सा उजाला चारो तरफ फैल जाता है यूं तो कोई आश्चर्य नहीं तुम्हारा यूं बार बार आना हाँ तुम्हें आना ही होगा इसी तरह से सदियों तक अनगिनत जन्मों तक लो पलक पावड़े बिछा दिये हैं मैंने घर की डियोढी पर व्याकुलता से भरे नयन प्रतीक्षारत रहेंगे आ नहीं जाते जब तक और आते ही तुम कहोगे मैं गया ही कब था मैं तो यहीं था तुम्हारे पास क्योंकि अब नहीं कुछ सुहाता सिर्फ तुम्हारे साथ के अलावा हाँ प्रिय तुम्हारे साथ होने में जो सुख है वो और कहीं नहीं यूं ही तो नहीं रखती तुम्हें अपने साथ  कल्पनाओं ख़यालों में  !!  सीमा असीम 
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इंतज़ार रब का मंदिर की लाइन में खड़ी करती रही इंतजार देर तक अपने रब को पूजने के लिए हाथों में पूजा की थाली पकड़े थकन छाती रही चेहरे का मीठापन घुला खारा खारा सा हो उठा सबकुछ घंटियों की घनन घनन से मिट जाता मन का गुबार एक लोटा जल शिव लिंग पर चढाने को इतना लम्बा इंतजार मन में ही बसी है तेरी मूरत दिन रात पूजती हूँ तुझे ही क्यों करूँ फिर इंतजार उस रब का  जब मन में ही बसते हैं मेरे रब रहते हैं मेरे आसपास !! सीमा असीम 
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गतांक से आगे  रिया तू मुस्करा  जब कभी सोचती हूँ, तो बस सोचती ही रह जाती हूँ, इतना ज्यादा दर्द में डूब जाती हूँ कि कहना मुश्किल लगने लगता है ! क्या आज इंसान सचमुच ऐसा ही हो गया है ? हैरत सी होती है कितनी परतें होती हैं, प्याज़ के छिलके की तरह परत दर परत !! सच में इस दर्द से कोई भी राहत नहीं किसी भी तरह से ! मैं तुम्हें नहीं बदल सकती लेकिन मैं तुम्हारा यह रूप भी नहीं देख सकती इसीलिए छोड़ दिया सबकुछ !  मुझे यह भी पता है कि तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम अपनी सोच को सही समझते हो ! जबकि तुम नहीं जानते तुम्हारी यही सोच एक दिन तुम्हें डूबा देगी ....मैं मानती हूँ कि सबके अपने अपने विचार होते हैं भावनाएं होती हैं .........लेकिन कभी किसी दूसरे की भावनाओं की कदर करना भी सीखो उसके मन को भी समझो ......जिसने अपना जीवन ही तुम्हें सौप दिया तुमने उसे मौत दे दी ....खत्म कर दिया ...पूरी तरह से मिटा दिया .....मार दिया उसे जीते जी ..... कैसे ? आखिर कैसे ? क्या ....... जब्त कहता है खामोशी से बसर हो जाए तो अच्छा  पर दर्द इतना है कि फूट पड़ता है ......
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कविता  धरा   कितना प्रेम करती है धरा इन पौधों से पेड़ों से पक्षियों से प्रकृति से पूरी कायनात से पता नहीं क्यों लुटा देना चाहती है अपना वात्सल्य भरा स्नेह वनस्पतियों पर हर अणु हर कण उसे बहुत प्यारा लगता है नदी का पानी सागर का पानी भी उसे कहाँ खारा लगता है हर शय उसे बहुत प्यारी लगती है पूरी दुनियां अपनी सी लगती है बेहद प्यारी सच में क्यंकि धरा प्रेम में है अपने प्रिय आसमां के प्रेम में प्यारे बेपरवाह उस आस माँ के प्रेम में !! सीमा असीम 
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गतांक से आगे ....... रिया तू मुस्कुरा  हाँ यह उतना ही सच जितना कि इस सृष्टि का होना ....तुम्हें बहुत चाहती हूँ, बेइंतिहा, बेसबब, बेहिसाब   लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं  कि तुम अब कुछ भी करते रहो और मैं आँखें बंद रख कर तुम पर विश्वास करती रहूँ .... सुनो प्रिय तुमने मेरे विश्वास को ठेस पहुंचाई है ..बहुत ज्यादा तकलीफ दी है मेरे आँखों को आंसुओं से भर दिया है, वे कभी नहीं मुसकुराती .उनसे खुशी कभी नहीं झलकती, चमकती हुई आँखों मे अब छाई रहती है उदासी ॥गहरी उदासी .... .शायद तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं होगा लेकिन सच तो यह है कि तुम्हारे मन की हर बात मुझे खुद बख़ुद पता चल जाती है .....न जाने कैसे ? लेकिन यह सच है !!!  तुम कुछ कहो या न कहो लेकिन मेरा दिल सबकुछ सुन लेता है ....तुम्हारी हर बात का मुझे अहसास हो जाता है और तुम्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं होता ........ मैं मानती हूँ कि तुम्हें मैंने ईश्वर बना दिया लेकिन तुम आखिर हो तो एक इंसान ही ...इस कलियुग के इंसान ...!! छोटी हो या बड़ी बातें मेरे दिल को कभी कभी इतना चोटिल कर देती हैं कि वे जख्म कभी भरने...
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किसी को पा लेना,भरमा लेना या भोग लेना कोई प्यार तो नहीं होता ,,,,,,,, प्यार तो एक खूबसूरत अहसास है जो हरदम अपने आसपास महसूस होता है .....रोम रोम से उसका नाम उच्चारित होता है , हमारी भावनाओं से जुड़ा हुआ .... कभी सच्चे मन से किसी को प्यार तो करके देखो फिर देखना दुनियाँ के छल प्रपंच सबसे दूर हो जाओगे ! भूल जाओगे अपना पराया या स्वार्थ ! प्रेम तो वही होता है जो किसी की खुशी के लिए खुद को मिटा ले, खत्म करले ! अपनी कोई गलती न होते हुए भी, गलती मान ले ! मेरी ख़्वाहिश अब कोई भी नहीं, कोई भी अभिलाषा नहीं, तुम खुश हो न प्रिय, बस यही काफी है, जियो जी भर के अपनी जिंदगी, मैं मर भी गयी तो क्या हुआ ? मेरा न तो प्रेम पर कोई ज़ोर है न ही तुम पर कोई ज़ोर है.... बस यह रम गया है और इसे यूं ही रमा रहने दो .....तुम मेरा दर्द नहीं समझते तो क्या हुआ मत समझो .....मैं तुम्हें दर्द देना भीं चाहती, कभी भी नहीं .... मैं प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में ...... और मैं हमेशा रहूँगी क्योंकि तुम हर पल में मेरे साथ हो .....मेरे रोने में , हँसने में, गाने में या किसी भी काम को करते वक्त तुम मेरे साथ हो ...