छोटी सी बालिका क्रांतिकारी मैना

 सन 18 57 में जो पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ था उसमें अनेकों बेटियाँ महिलाएं देश को आजाद करने में शहीद हुई थी उसमें महान क्रांतिकारी नाना साहब की 14 वर्षीय छोटी सी उम्र की बालिका कुमारी मैना की कहानी बहुत ही मार्मिक है जिसे पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। कानपुर में होने वाली स्वतन्त्रता संग्राम की  क्रांति का नेतृत्व नाना साहब कर रहे थे । एक दिन कुछ क्रांतिकारी उनके सामने कुछ अकेली निःसहाय अंग्रेज़ स्त्रियों व बच्चों को पकड़ कर लाये और कहा कि नाना साहब आप उन्हें दंड दे।  पर एक च्चा भारतीय होने के नाते नाना ने कहा नहीं हम निहत्थे लोगों पर तक कभी वार नहीं करते फिर स्त्रियों और बच्चों को मारने की यह तो कल्पना ही नहीं कर सकते यह तो पाप की निशानी है नाना साहब ने ऐसा कहते हुए उन स्त्रियों और बच्चों की जिम्मेदारी अपनी किशोरी बेटी मैना को सौंप दी और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का आदेश दे दिया । नाना साहब अन्य क्रांतिकारियों के साथ बिठूर चले गए और मैना शरणागत हो कर आए अंग्रेज़ स्त्रियॉं और बच्चों को लेकर अंगरक्षक माधव के साथ गंगा तट पर पहुंची वहां पर उन्हें खबर मिली कि नाना साहब के कानपुर छोड़ते ही अंग्रेजी फौज ने कानपुर पर चढ़ाई कर दी है और उनके सैनिक महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं यह सुनकर मैना का खून खौल उठा, उन्होंने अंग्रेज स्त्रीयों और बच्चों की र जलती हुई नजरों से देखा, पर उन्हें तुरंत ही अपने पिता का आदेश याद आ गया । उन्होंने अंगरक्षक माधव से कहा, इन लोगों को सुरक्षित स्थान पर छोड़ कर हम शीघ्र ही लौट आयेंगे फिर मैं अत्याचारी अंग्रेजों से गिन गिन कर बदला लूंगी । पर अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अंग्रेजों की एक टुकड़ी गंगा तट पर आ पहुंची । अंग्रेज़ सैनिकों की गोली से माधव उसी वक्त मारा गया । मैना को अंग्रेजों के द्वारा पकड़ लिया गया वह जानते हुए ही कि वह नाना साहब की लड़की है । अंग्रेज सैनिकों की खुशी का ठिकाना ना रहा, उसे पहले तो तरह-तरह के लालच दिए गए फिर उसे धमकियां दी गई कि वह अपने अन्य साथियों का पता बता दे तो उसे छोड़ दिया जायेगा पर मैंना तो पेशवा की बेटी थी, वह चट्टान की तरह अडिग खड़ी रही उन्हें पेड़ से बांधकर भयंकर यातनाएं दी गई। उसका प्या से गला सूख गया होठों पर पपड़ी जम गई पर उन्हें पानी की एक बूंद तक नहीं दी गई फिर उसके बाद अंग्रेज सैनिकों ने उसके चारों ओर लकड़ियों का गट्ठर चुनकर उनके लिए चिता बनाकर तैयार कर दी और बालिका मैना से कहा, अब भी समय है बता दो नहीं तो जिंदा भून दिया जायेगा । इसके उत्तर में मैना ने अंग्रेजों के मुंह पर थूक दिया । चिता में आग लगा दी गई मैना ना तो चीखी और ना ही चिल्लाई । जलते हुए फिर उससे एक बार पूछा गया लेकिन वे झुकने के बजाय विद्रूपता से हंस पड़ी, और कहा तुम्हें जो करना है कर लो । उन्हें जलता देखकर शरणागत अंग्रेज़ स्त्रियों  बच्चों की आँखों में भी आंसू आ गए पर अपने ही अंग्रेज़ लोगों से वे अपनी संरक्षिका की जान नहीं बचा सके । भारत की इस छोटी सी बलिदानी बेटी पर भारत हिंदुस्तान को सदा गर्व रहेगा कि वह जिंदा जल गई पर उसने अंग्रेजों के सामने अपनी गर्दन नहीं झुका, न ही उसने अपने क्रांतिकारी साथियों के पते ठिकाने बताएं 

सुंदर मासूम बालिका मैना की बहादुरी

 नाना साहब की पुत्री मैना को जलाकर भस्म कर दिया गया।  1857 की क्रांति के प्रमुख विद्रोही नेता  नाना साहब की पुत्री बालिका मैना आजादी की सबसे छोटी सिपाही थी जो अंग्रेजों के हाथों जिंदा जला दी गई थी । सन 1857 में स्वतन्त्रता की जब क्रांति हुई थी उस दौरान कानपुर में नाना साहब असफल होने के पश्चात वहां से भाग खड़े हुए तो जल्दी-जल्दी में अपनी पुत्री मैना को साथ में ना ले जा सके थे ,  अंग्रेज कानपुर में विद्रोह को कुचलने के बाद बिठूर में नाना साहब के महल में जा पहुंचे और सारा राज महल लूटपाट लिया । तत्पश्चात अंग्रेजों ने तोप से नाना साहब का महल जलाकर राख कर देने का निश्चय किया । अंग्रेजो ने नाना साहब के महल को उड़ाने के लिए फिर तोप उस महल के सामने रखी तो उसी समय अचानक महल के बरामदे में एक बहुत सुंदर सी बालिका दौड़ती हुई आ गई बालिका को देख सेनापति को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि जब मैं हल को लूट रहा था उस वक्त यह बालिका वहां कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रही थी फिर अचानक से कहाँ से आ गायी । बालिका सेनापति को गोली बरसाने से मना करती है बालिका का करुणा म और प्यारा सा चेहरा देखकर सेनापति हे को उस पर दया आ गई थी जब सेनापति ने पूछा कि तुम क्या चाहती हो ? तुम यहां पर बीच में आकर क्यों खड़ी हो गई हो ?

तो बालिका ने तुरंत जवाब दिया क्या आप मुझ पर दया करके थोड़ी सी कृपा करके इस महल की रक्षा करेंगे ?

इस पर सेनापति ने बालिका से पूछा कि तुम्हारा क्या उद्देश्य है?

तभी बालिका भी अंग्रेजों से पूछती है इस महल को गिराने में तुम्हारा क्या नाम क्या उद्देश्य है?

 तत्पश्चात सेनापति ने जवाब में बोला यह मकान विद्रोहियों के नेता नाना साहब का है इसलिए सरकार ने हमें इसे गिरा देने का आदेश दिया है । सेनापति ने बालिका से कहा ।

इस पर बालिका मैना बोली कि जो दोषी है या जो गलत है आप को उसे सजा देनी चाहिए ना कि इस निर्जीव मकान को और मकान का तो कोई कसूर भी नहीं है, मुझे यह मकान बहुत प्यारा लगता है, मैं आपसे विनती करती हूं कि आप इस मकान की रक्षा करो ।

 इसके पश्चात मैना अंग्रेज सेनापति से विनम्र स्वर में कहती है, मैं आप की पुत्री मैरी की सहेली हूं आप फिर भी इस मकान की रक्षा नहीं करेंगे । मैंने आपकी बेटी के साथ बहुत प्यार के साथ इस घर में दिन बताए हैं । खूब खेला है । बालिका की बात सुनते ही सेनापति को ज्ञात हुआ कि अरे यह तो नाना साहब की पुत्री है बालिका के द्वारा परिचय देने पर सेनापति ने उसे तुरंत पहचान लिया परंतु सेनापति ने कहा कि वह सरकारी नौकर है और सरकार की आज्ञा को किसी तरह से भी नहीं टाला जा सकता।

 तभी जनरल आउटर वहां पहुंचे और गुस्सा होते हुए बोले, अब तक इस महल को क्यों नहीं उड़ाया गया ? सेनापति ने जनरल के हाथ जोड़कर विनती करते हुए कहा कि यह महल और मैना को छोड़ दो परंतु आउटरम ने इसे अस्वीकार कर दिया । इससे दुखी होकर सेनापति हे वहां से चले गए । तत्पश्चात आउटरम ने महल को चारों तरफ से घेर लिया। सिपाही महल का फाटक तोड़कर अंदर चले गए और बालिका मैना को तलाशने लगे । पर आश्चर्य है कि मैना उन सिपाहियों के हाथी न लगी शाम के समय जनरल गवर्नर लार्ड केनिन का तार आया आउटरम के पास आया जिसके अनुसार नाना साहब के सारे स्मृति चिन्ह तक मिटा देने की बात  लिखी गई थी । थोड़ी ही देर के अंदर ही उस महल को जलाकर खाक कर दिया गया उस समय लंदन के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित अखबार टाइम्स ने 6 सितंबर को नाना साहब के बारे में एक खबर छपी कि बड़े दुख का विषय है भारत सरकार अभी तक अंग्रेजों के हत्याकांड के दोषी नाना साहब को नहीं पकड़ सकी है । उस दिन पार्लियामेंट हाउस में सेनापति हे की उस रिपोर्ट का भी उपहास किया गया, जिसमें उसने बालिका मैना के लिए  क्षमा याचना की मांग करी थी । अंग्रेजों ने नाना साहब के सगे संबंधियों तक को मार डालने का आदेश दे दिया था, उस पर सेनापति हे उसकी बेटी के लिए ही छोड़ देने की प्रार्थना कर रहे थे।  यह बात अंग्रेजों को किसी तरह से हजम नहीं हो पा रही थी।

 सन 18 57 को सितंबर के महीने में आधी रात्रि के समय चाँद की चमकती चांदनी में एक छोटी सी बालिका सादा स्वच्छ सफेद वस्त्र पहनकर अपने महल के अवशेषों पर बैठ कर रो रही थी । जब जनरल आउटरम वहां पहुंचे तो उन्होंने उस बालिका को फौरन पहचान लिया। अरे यह तो नाना साहब की लड़की मैना ही है । इसके पश्चात जनरल  आउटरम के सैनिकों  ने बालिका को चारों तरफ से घेर लिया और गिरफ्तार कर लिया । बाद में उसे कानपुर के किले में ले जाकर कैद कर दिया गया । उसे तरह तरह से लालच दिया गया कि वो नाना साहब का पता बता दे पर उसने कुछ भी नहीं बताया और अंत में नाना साहब की इकलौती पुत्री मैना को ती हुई आग में जलाकर भस्म कर दिया गया । विश्व में शांति और सरलता की मूर्ति अनुपम सुंदर छोटी सी बालिका को जलती  हुई देखकर ने उसे देवी समझ कर हाथ जोड़कर प्रणाम किया । यह उसके लिए सच्ची श्रद्धांजलि थी ।

 बालिका मैना के पिता नाना साहब का जन्म बेरूग्राम निवासी माधव राय नारायण भट्ट के घर 1919 मई 18 24 को गंगा के पास स्थित बिठूर कानपुर में हुआ था । इनके पिता ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनुपम देश प्रेम के कारण सदैव अमर हो गए थे । इनके पिता ने बाल्य अवस्था में ही घुड़सवारी मल्लयुद्ध और तलवार चलाने में अपनी कुशलता प्राप्त कर ली थी।

 सन 18 सो 57 के स्वाधीनता संग्राम के शुरुआत में तो भारतीय क्रांतिकारियों ने जीत हासिल कर ली लेकिन बाद कुछ समय के बाद अंग्रेज सैनिकों का पलड़ा भारी होने लगा था और क्रांतिकारी कमजोर पड़ने लगे थे इस दौरान भारतीय सेनानियों का नेतृत्व नाना साहेब पेशवा कर रहे थे इस खराब माहौल में उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों के आग्रह पर बिठूर का महल छोड़ने का निर्णय लिया और इसके साथ उन्होंने यह भी योजना बनाई थी किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर फिर से वह सेना एकत्र करेंगे और अंग्रेजों के साथ नए तरीके से मोर्चा लेंगे किंतु 13 साल की पुत्री मैंना कुमारी ने कहा कि वह महल छोड़कर नहीं जाएगी और अपने पिता के ना रहने पर महल की रक्षा करेगी और महल में ही रहेगी क्योंकि उसे अपने महल से बहुत प्यार है । अपनी बेटी मैंना कुमारी की इस बात को सुनकर नाना साहब बड़े असमंजस में पड़ गए थे कि अकेली बेटी को यहां छोड़ कर कैसे जाए क्योंकि उसकी सुरक्षा जरूरी है और इधर मैंना कुमारी सोच रही थी कि अगर मैं पिता के साथ जाऊंगी तो उनकी देश सेवा करने में समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी, इसी कारण उसने अपने पिता से कहा कि वह बिठूर के महल में ही रहेगी।  नाना साहब ने अपनी बेटी को समझाया कि अंग्रेज बंदियों के साथ बहुत गंदा व्यवहार करते हैं उनके साथ मारपीट करते हैं लड़कियों की सुरक्षित रहना मुश्किल  है उनके राज में लेकिन मैंना अपने पिता की तरह ही बहुत सासी और बहादुर लड़की थी और उसे अच्छी तरह से अस्त्र शस्त्र चलाने भी आते थे इसलिए उसने अपने पिता से कहा पिताजी में क्रांतिकारी की पुत्री हूं मुझे अपने शरीर और नारी धर्म की रक्षा करना भी आता है आप निश्चिंत रहें मैं अपनी रक्षा करने की पूरी कोशिश करूंगी । नाना साहब अपनी बेटी की इन उत्साह और जोश भरी बातों को सुनकर उसे महल में छोड़ कर अकेले जंग के लिए निकल गए।

 उनकी नाना साहब के ऊपर एक लाख रुपये  का इनाम घोषित किया हुआ था । इस वजह से अंग्रेज सैनिक उनके पीछे लगे हुए थे ।  हम सब भारतवासी हमेशा उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति कृतज्ञ रहेंगे, जिन्हें हम जानते हैं या हमारी जानकारी में नहीं है उन सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति हम हमेशा हमेशा कृतज्ञ रहेंगे क्योंकि उन्होंने अपना सर्वस्व निछावर करके हमारे देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया और हमें स्वतंत्र देश में, एक आजाद देश में रहने का अवसर दिया अपना तन मन और धन सब कुछ निछावर करके  

सीमा असीम सक्सेना, बरेली उ प्र

९४५८६०६४६९ 

छोटी सी बालिका क्रांतिकारी मैना

 सन 18 57 में जो पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ था उसमें अनेकों बेटियाँ महिलाएं देश को आजाद करने में शहीद हुई थी उसमें महान क्रांतिकारी नाना साहब की 14 वर्षीय छोटी सी उम्र की बालिका कुमारी मैना की कहानी बहुत ही मार्मिक है जिसे पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। कानपुर में होने वाली स्वतन्त्रता संग्राम की  क्रांति का नेतृत्व नाना साहब कर रहे थे । एक दिन कुछ क्रांतिकारी उनके सामने कुछ अकेली निःसहाय अंग्रेज़ स्त्रियों व बच्चों को पकड़ कर लाये और कहा कि नाना साहब आप उन्हें दंड दे।  पर एक च्चा भारतीय होने के नाते नाना ने कहा नहीं हम निहत्थे लोगों पर तक कभी वार नहीं करते फिर स्त्रियों और बच्चों को मारने की यह तो कल्पना ही नहीं कर सकते यह तो पाप की निशानी है नाना साहब ने ऐसा कहते हुए उन स्त्रियों और बच्चों की जिम्मेदारी अपनी किशोरी बेटी मैना को सौंप दी और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का आदेश दे दिया । नाना साहब अन्य क्रांतिकारियों के साथ बिठूर चले गए और मैना शरणागत हो कर आए अंग्रेज़ स्त्रियॉं और बच्चों को लेकर अंगरक्षक माधव के साथ गंगा तट पर पहुंची वहां पर उन्हें खबर मिली कि नाना साहब के कानपुर छोड़ते ही अंग्रेजी फौज ने कानपुर पर चढ़ाई कर दी है और उनके सैनिक महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं यह सुनकर मैना का खून खौल उठा, उन्होंने अंग्रेज स्त्रीयों और बच्चों की र जलती हुई नजरों से देखा, पर उन्हें तुरंत ही अपने पिता का आदेश याद आ गया । उन्होंने अंगरक्षक माधव से कहा, इन लोगों को सुरक्षित स्थान पर छोड़ कर हम शीघ्र ही लौट आयेंगे फिर मैं अत्याचारी अंग्रेजों से गिन गिन कर बदला लूंगी । पर अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अंग्रेजों की एक टुकड़ी गंगा तट पर आ पहुंची । अंग्रेज़ सैनिकों की गोली से माधव उसी वक्त मारा गया । मैना को अंग्रेजों के द्वारा पकड़ लिया गया वह जानते हुए ही कि वह नाना साहब की लड़की है । अंग्रेज सैनिकों की खुशी का ठिकाना ना रहा, उसे पहले तो तरह-तरह के लालच दिए गए फिर उसे धमकियां दी गई कि वह अपने अन्य साथियों का पता बता दे तो उसे छोड़ दिया जायेगा पर मैंना तो पेशवा की बेटी थी, वह चट्टान की तरह अडिग खड़ी रही उन्हें पेड़ से बांधकर भयंकर यातनाएं दी गई। उसका प्या से गला सूख गया होठों पर पपड़ी जम गई पर उन्हें पानी की एक बूंद तक नहीं दी गई फिर उसके बाद अंग्रेज सैनिकों ने उसके चारों ओर लकड़ियों का गट्ठर चुनकर उनके लिए चिता बनाकर तैयार कर दी और बालिका मैना से कहा, अब भी समय है बता दो नहीं तो जिंदा भून दिया जायेगा । इसके उत्तर में मैना ने अंग्रेजों के मुंह पर थूक दिया । चिता में आग लगा दी गई मैना ना तो चीखी और ना ही चिल्लाई । जलते हुए फिर उससे एक बार पूछा गया लेकिन वे झुकने के बजाय विद्रूपता से हंस पड़ी, और कहा तुम्हें जो करना है कर लो । उन्हें जलता देखकर शरणागत अंग्रेज़ स्त्रियों  बच्चों की आँखों में भी आंसू आ गए पर अपने ही अंग्रेज़ लोगों से वे अपनी संरक्षिका की जान नहीं बचा सके । भारत की इस छोटी सी बलिदानी बेटी पर भारत हिंदुस्तान को सदा गर्व रहेगा कि वह जिंदा जल गई पर उसने अंग्रेजों के सामने अपनी गर्दन नहीं झुका, न ही उसने अपने क्रांतिकारी साथियों के पते ठिकाने बताएं 

सुंदर मासूम बालिका मैना की बहादुरी

 नाना साहब की पुत्री मैना को जलाकर भस्म कर दिया गया।  1857 की क्रांति के प्रमुख विद्रोही नेता  नाना साहब की पुत्री बालिका मैना आजादी की सबसे छोटी सिपाही थी जो अंग्रेजों के हाथों जिंदा जला दी गई थी । सन 1857 में स्वतन्त्रता की जब क्रांति हुई थी उस दौरान कानपुर में नाना साहब असफल होने के पश्चात वहां से भाग खड़े हुए तो जल्दी-जल्दी में अपनी पुत्री मैना को साथ में ना ले जा सके थे ,  अंग्रेज कानपुर में विद्रोह को कुचलने के बाद बिठूर में नाना साहब के महल में जा पहुंचे और सारा राज महल लूटपाट लिया । तत्पश्चात अंग्रेजों ने तोप से नाना साहब का महल जलाकर राख कर देने का निश्चय किया । अंग्रेजो ने नाना साहब के महल को उड़ाने के लिए फिर तोप उस महल के सामने रखी तो उसी समय अचानक महल के बरामदे में एक बहुत सुंदर सी बालिका दौड़ती हुई आ गई बालिका को देख सेनापति को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि जब मैं हल को लूट रहा था उस वक्त यह बालिका वहां कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रही थी फिर अचानक से कहाँ से आ गायी । बालिका सेनापति को गोली बरसाने से मना करती है बालिका का करुणा म और प्यारा सा चेहरा देखकर सेनापति हे को उस पर दया आ गई थी जब सेनापति ने पूछा कि तुम क्या चाहती हो ? तुम यहां पर बीच में आकर क्यों खड़ी हो गई हो ?

तो बालिका ने तुरंत जवाब दिया क्या आप मुझ पर दया करके थोड़ी सी कृपा करके इस महल की रक्षा करेंगे ?

इस पर सेनापति ने बालिका से पूछा कि तुम्हारा क्या उद्देश्य है?

तभी बालिका भी अंग्रेजों से पूछती है इस महल को गिराने में तुम्हारा क्या नाम क्या उद्देश्य है?

 तत्पश्चात सेनापति ने जवाब में बोला यह मकान विद्रोहियों के नेता नाना साहब का है इसलिए सरकार ने हमें इसे गिरा देने का आदेश दिया है । सेनापति ने बालिका से कहा ।

इस पर बालिका मैना बोली कि जो दोषी है या जो गलत है आप को उसे सजा देनी चाहिए ना कि इस निर्जीव मकान को और मकान का तो कोई कसूर भी नहीं है, मुझे यह मकान बहुत प्यारा लगता है, मैं आपसे विनती करती हूं कि आप इस मकान की रक्षा करो ।

 इसके पश्चात मैना अंग्रेज सेनापति से विनम्र स्वर में कहती है, मैं आप की पुत्री मैरी की सहेली हूं आप फिर भी इस मकान की रक्षा नहीं करेंगे । मैंने आपकी बेटी के साथ बहुत प्यार के साथ इस घर में दिन बताए हैं । खूब खेला है । बालिका की बात सुनते ही सेनापति को ज्ञात हुआ कि अरे यह तो नाना साहब की पुत्री है बालिका के द्वारा परिचय देने पर सेनापति ने उसे तुरंत पहचान लिया परंतु सेनापति ने कहा कि वह सरकारी नौकर है और सरकार की आज्ञा को किसी तरह से भी नहीं टाला जा सकता।

 तभी जनरल आउटर वहां पहुंचे और गुस्सा होते हुए बोले, अब तक इस महल को क्यों नहीं उड़ाया गया ? सेनापति ने जनरल के हाथ जोड़कर विनती करते हुए कहा कि यह महल और मैना को छोड़ दो परंतु आउटरम ने इसे अस्वीकार कर दिया । इससे दुखी होकर सेनापति हे वहां से चले गए । तत्पश्चात आउटरम ने महल को चारों तरफ से घेर लिया। सिपाही महल का फाटक तोड़कर अंदर चले गए और बालिका मैना को तलाशने लगे । पर आश्चर्य है कि मैना उन सिपाहियों के हाथी न लगी शाम के समय जनरल गवर्नर लार्ड केनिन का तार आया आउटरम के पास आया जिसके अनुसार नाना साहब के सारे स्मृति चिन्ह तक मिटा देने की बात  लिखी गई थी । थोड़ी ही देर के अंदर ही उस महल को जलाकर खाक कर दिया गया उस समय लंदन के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित अखबार टाइम्स ने 6 सितंबर को नाना साहब के बारे में एक खबर छपी कि बड़े दुख का विषय है भारत सरकार अभी तक अंग्रेजों के हत्याकांड के दोषी नाना साहब को नहीं पकड़ सकी है । उस दिन पार्लियामेंट हाउस में सेनापति हे की उस रिपोर्ट का भी उपहास किया गया, जिसमें उसने बालिका मैना के लिए  क्षमा याचना की मांग करी थी । अंग्रेजों ने नाना साहब के सगे संबंधियों तक को मार डालने का आदेश दे दिया था, उस पर सेनापति हे उसकी बेटी के लिए ही छोड़ देने की प्रार्थना कर रहे थे।  यह बात अंग्रेजों को किसी तरह से हजम नहीं हो पा रही थी।

 सन 18 57 को सितंबर के महीने में आधी रात्रि के समय चाँद की चमकती चांदनी में एक छोटी सी बालिका सादा स्वच्छ सफेद वस्त्र पहनकर अपने महल के अवशेषों पर बैठ कर रो रही थी । जब जनरल आउटरम वहां पहुंचे तो उन्होंने उस बालिका को फौरन पहचान लिया। अरे यह तो नाना साहब की लड़की मैना ही है । इसके पश्चात जनरल  आउटरम के सैनिकों  ने बालिका को चारों तरफ से घेर लिया और गिरफ्तार कर लिया । बाद में उसे कानपुर के किले में ले जाकर कैद कर दिया गया । उसे तरह तरह से लालच दिया गया कि वो नाना साहब का पता बता दे पर उसने कुछ भी नहीं बताया और अंत में नाना साहब की इकलौती पुत्री मैना को ती हुई आग में जलाकर भस्म कर दिया गया । विश्व में शांति और सरलता की मूर्ति अनुपम सुंदर छोटी सी बालिका को जलती  हुई देखकर ने उसे देवी समझ कर हाथ जोड़कर प्रणाम किया । यह उसके लिए सच्ची श्रद्धांजलि थी ।

 बालिका मैना के पिता नाना साहब का जन्म बेरूग्राम निवासी माधव राय नारायण भट्ट के घर 1919 मई 18 24 को गंगा के पास स्थित बिठूर कानपुर में हुआ था । इनके पिता ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनुपम देश प्रेम के कारण सदैव अमर हो गए थे । इनके पिता ने बाल्य अवस्था में ही घुड़सवारी मल्लयुद्ध और तलवार चलाने में अपनी कुशलता प्राप्त कर ली थी।

 सन 18 सो 57 के स्वाधीनता संग्राम के शुरुआत में तो भारतीय क्रांतिकारियों ने जीत हासिल कर ली लेकिन बाद कुछ समय के बाद अंग्रेज सैनिकों का पलड़ा भारी होने लगा था और क्रांतिकारी कमजोर पड़ने लगे थे इस दौरान भारतीय सेनानियों का नेतृत्व नाना साहेब पेशवा कर रहे थे इस खराब माहौल में उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों के आग्रह पर बिठूर का महल छोड़ने का निर्णय लिया और इसके साथ उन्होंने यह भी योजना बनाई थी किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर फिर से वह सेना एकत्र करेंगे और अंग्रेजों के साथ नए तरीके से मोर्चा लेंगे किंतु 13 साल की पुत्री मैंना कुमारी ने कहा कि वह महल छोड़कर नहीं जाएगी और अपने पिता के ना रहने पर महल की रक्षा करेगी और महल में ही रहेगी क्योंकि उसे अपने महल से बहुत प्यार है । अपनी बेटी मैंना कुमारी की इस बात को सुनकर नाना साहब बड़े असमंजस में पड़ गए थे कि अकेली बेटी को यहां छोड़ कर कैसे जाए क्योंकि उसकी सुरक्षा जरूरी है और इधर मैंना कुमारी सोच रही थी कि अगर मैं पिता के साथ जाऊंगी तो उनकी देश सेवा करने में समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी, इसी कारण उसने अपने पिता से कहा कि वह बिठूर के महल में ही रहेगी।  नाना साहब ने अपनी बेटी को समझाया कि अंग्रेज बंदियों के साथ बहुत गंदा व्यवहार करते हैं उनके साथ मारपीट करते हैं लड़कियों की सुरक्षित रहना मुश्किल  है उनके राज में लेकिन मैंना अपने पिता की तरह ही बहुत सासी और बहादुर लड़की थी और उसे अच्छी तरह से अस्त्र शस्त्र चलाने भी आते थे इसलिए उसने अपने पिता से कहा पिताजी में क्रांतिकारी की पुत्री हूं मुझे अपने शरीर और नारी धर्म की रक्षा करना भी आता है आप निश्चिंत रहें मैं अपनी रक्षा करने की पूरी कोशिश करूंगी । नाना साहब अपनी बेटी की इन उत्साह और जोश भरी बातों को सुनकर उसे महल में छोड़ कर अकेले जंग के लिए निकल गए।

 उनकी नाना साहब के ऊपर एक लाख रुपये  का इनाम घोषित किया हुआ था । इस वजह से अंग्रेज सैनिक उनके पीछे लगे हुए थे ।  हम सब भारतवासी हमेशा उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति कृतज्ञ रहेंगे, जिन्हें हम जानते हैं या हमारी जानकारी में नहीं है उन सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति हम हमेशा हमेशा कृतज्ञ रहेंगे क्योंकि उन्होंने अपना सर्वस्व निछावर करके हमारे देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया और हमें स्वतंत्र देश में, एक आजाद देश में रहने का अवसर दिया अपना तन मन और धन सब कुछ निछावर करके  

सीमा असीम सक्सेना, बरेली उ प्र

९४५८६०६४६९

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