रूह
इस दौड़ भाग भरी और बेचैनी से भर देने वाली जिंदगी में मैं चलना चाहती थी तुम्हारे साथ साथ इस छोर से उस छोर तक धरती से आकाश तक अंबर से गगन तक और क्षितिज तक पहुंचना चाहती थी मैं थोड़ी देर टिके रहना चाहती थी एक दूसरे का सहारा बनकर कभी मैं लड़खड़ाती , तो तुम सहारा देते जब तुम लड़खड़ाते तो मैं सहारा देती पर नहीं शायद तुम्हें सिर्फ एक सहारा मंजूर नहीं था क्योंकि सहारे बदल बदल कर चलना तुम्हें शोभा देता होगा कुछ दूर कुछ कदम किसी का हाथ पकड़कर कुछ कदम किसी और का हाथ पकड़कर चलते जाना तुम्हें अच्छा होता होगा शायद तभी तो तुम ने मेरा साथ छोड़ा और किसी दूसरे का हाथ पकड़ लिया किसी दूसरे का हाथ छोड़ने के बाद क्या तुम फिर मेरा हाथ पकड़ पाओगे क्या तुम फिर वही प्यारे इंसान बन पाओगे जो तुम मेरे साथ चलते चलते बने थे एक बहुत प्यारे इंसान जिसका रिश्ता था रूह से रूह तक मेरा अभी भी है पर तुमने रूह से ज्यादा जरूरी समझा शरीर को तुमने शरीर से रिश्ता बनाया द...