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Showing posts from January, 2022

रूह

  इस दौड़ भाग भरी और बेचैनी से भर देने वाली जिंदगी में  मैं चलना चाहती थी तुम्हारे साथ साथ इस छोर से उस छोर तक धरती से आकाश तक अंबर से गगन तक और क्षितिज तक पहुंचना चाहती थी  मैं थोड़ी देर टिके रहना चाहती थी  एक दूसरे का सहारा बनकर  कभी मैं लड़खड़ाती , तो तुम सहारा देते  जब तुम लड़खड़ाते तो मैं सहारा देती  पर नहीं शायद तुम्हें  सिर्फ एक सहारा मंजूर नहीं था क्योंकि   सहारे बदल बदल कर चलना तुम्हें शोभा देता होगा  कुछ दूर कुछ कदम किसी का हाथ पकड़कर  कुछ कदम किसी और का हाथ पकड़कर  चलते  जाना तुम्हें अच्छा  होता होगा शायद  तभी तो तुम ने मेरा साथ छोड़ा और किसी दूसरे का हाथ पकड़ लिया  किसी दूसरे का हाथ छोड़ने के बाद क्या तुम फिर मेरा हाथ पकड़ पाओगे  क्या तुम फिर वही प्यारे इंसान बन पाओगे  जो तुम मेरे साथ चलते चलते बने थे  एक बहुत प्यारे  इंसान  जिसका रिश्ता था रूह से रूह तक  मेरा अभी भी है  पर तुमने रूह से ज्यादा जरूरी समझा शरीर को   तुमने शरीर से रिश्ता बनाया  द...

साथ हमारे

 यह सूरज चांद सितारे  सब कोई तो है साथ हमारे  जब मैं गाती हूं तो यह सब भी  गाते हैं जब मैं रोती हूं तो इस सब भी रोते हैं और जब मैं हंसती हूँ तो इससे भी हंस पड़ते हैं  क्योंकि यही सब तो साक्षी है हमारे एहसासों के  हमारे साथ के  कितनी सारी बातों के गवाह है ना यह सब  दरअसल देखा जाए तो यही सब तो गवाह है  हमारी तुम्हारी हर बात के  जहां कोई नहीं होता वहा यह साथ थे  कल भी थे  आज भी है  और हमेशा रहेंगे  यह सूरज चांद सितारे हमारे साक्षी हर बात के... सीमा असीम 26,1,22

बंधन

 तुम्हें हर पल याद करना  इतना मुश्किल नहीं है  जितना मुश्किल है  तुम्हें पल भर को भूल जाना  कि तुम खुद चले आते हो  कभी मेरे ख्यालों में  कभी मेरे ख्वाबों में  कभी मेरी बातों में  कहाँ भूलते होगे तुम भी मुझे पल भर को  जब हर पल मैं तुम्हें याद करती हूँ  तुमसे बात करती हूँ मन ही मन में  कि बध गए हो तुम मेरे मन के बंधन में  और मन के बंधन से कैसे मुक्ति मिलेगी न जीते जी न ही मरने के बाद  हां बांध लिया है मैंने तुम्हें  बन के बंधन में  जन्म जन्मांतर के लिए!! सीमा असीम 25,1,22

मनन

 मैं सोचती नहीं हूँ तुम्हें  बस मनन करती हूँ तुम्हें  दिन रात सुबह शाम  हर पल हर वक्त  सिर्फ तुम ही तुम  सोचना नहीं चाहती अब तुम्हें मैं  कि तुम्हें सोचते ही  मेरी धड़कने थम जाती हैं  बेहोशी तारी हो जाती है  मैं खुद में ही नहीं रह पाती  आ जाती हूँ तुम तक  समा जाती हूँ तुम में  फिर मैं मैं नहीं बल्कि तुम हो जाती हूँ  सिर्फ तुम  बस इसलिए करती रहती हूँ मनन  तुम्हारे नाम को ले ले कर जपती रहती हूँ  माला की तरह मन ही मन में  तुम्हें हाँ सिर्फ तुम्हें ... सीमा असीम  23, 1,22 
अभी वह मिलन के बारे में सोच रही थी कि मिलन का फोन आ गया कहां हो अभिषेक क्या तुम पहुंच गई वहां पर हां हां मैं आ गई हूं और आप किस समय आएगी मैं समय पर पहुंच जाऊंगा और हां सुनो क्या तुमने ऑर्गेनाइजर को मेरा नंबर दिया था हां क्यों कोई गलती हो गई क्या नहीं नहीं गलती नहीं उल्लू को कहीं फोन आ गया था मेरे पास किस समय पर आना है और सम्मान शायद वह मेरे हाथों ही दिलवाना चाहते हैं अरे वाह यह तो बहुत अच्छी बात है एक पंथ दो काज  हां तुम कह सकती हो एक पंथ दो काज, मिलना भी होगा और सम्मान भी मेरे हाथों से विशी की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था ईश्वर भी कितना मन मौजी है जब मन किया तो ढेरों खुशियाँ दे देगा और जब किया तो इतने गम...  खैर कोई बात नहीं जो होता है अच्छे के लिए ही होता है वो कहते हैं ना देर आए दुरुस्त आए  एक अलग सा सॉफ्टवेयर है उसके लिए उसके दिल में लेकिन नहीं पता ही क्या है क्या यह प्रेम है या केवल एक  भावना जो भी है ठीक है उससे बात करना अच्छा लगता है और मिलने का मन भी करता है  आज उसके दोनों काम पूरे हो जायेंगे! वो उसके साथ खूब बातें करेगी खूब सारा समय भी उसके साथ में बित...

एक माला बनती है

 तुम्हें सोचना और तुम्हें लिखना दोनों अलग चीज है  क्योंकि सोचती तो हर वक्त हूँ  तुम्हें  मैं पल भर को भी नहीं भूलती हूं तुम्हें   पर लिखती हूं कभी कभी तुम्हें  तुम्हें लिखना मतलब दर्द में डूब जाना  असह पीड़ा को सहन करना  डूबना और डूबते चले जाना  क्योंकि तुम्हें लिखना आसान नहीं है मुझे  तुम्हें सोचना आसान है  बहुत सरल है  जैसे तुम्हें सोचते हुए कभी मुस्कुरा देना और कभी रो के आंसू बहा लेना  कभी तुमसे मन ही मन बातें  करना  कभी तुमसे प्यार की मनुहारें  करना  कितना सरल  है ना सोचना तुम्हें  पर तुम्हें लिखना कितना मुश्किल  एक-एक आंसू से एक-एक अक्षर को लिखा जाता है  जब भी मैं तुम्हें लिखने की कोशिश करती हूं  तो बस आंसुओं की धारा से मैं अपने खून से सीचते हुए  एक-एक शब्द को पिरोती हूं और फिर  आंसू और  खून से मिलकर गुधते हैं एक एक शब्द तब बनती है एक माला  तुम्हें लिखने की  डूब कर सोचते हुए... सीमा असीम 21,1,22
 प्रकृति किसी को यूं ही सजा नहीं देती, बहुत दुखी होकर बहुत तकलीफ में आ कर, बहुत कष्ट सहकर चुपचाप सबकुछ अकेले ही सब्र के साथ रहकर जब थक जाती है तब फिर वह तांडव करती है इतना भयंकर तांडव कि जिस जिस ने उसको सताया उसकी रूह तक कांप उठे, रोम रोम उसका सिहर जाए, अब तक जो सहती आई थी प्रकृति बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले, अब कुछ उसे अपना बदला लेना ही होता है आखिर वो कब तक रहेगी सांझ की सुबह हो ही जाए, हर उस शख्स को उसकी करने की सजा मिल ही जाए, उसके दिल में जो चल रही थी दावानल उसको थोड़ी सी शीतलता मिले ही जाए,कुछ उसके सब्र को करार आए  प्रकृति जैसे अपना न्याय करती है वैसे वह दूसरे का भी न्याय करती है, किसी के प्रति भी किए गए अन्याय को सहन नहीं कर पाती अगर वह  अन्याय सहन करती रहती तो मैं कभी बदला नहीं लेती,, उसके साथ हुआ जो भी अन्याय है उसी ने तो मिलना ही मिलना है प्रकृति को अपना न्याय लेना आता है और वह अपना न्याय लेकर रहती है,,,

दिल खिल जाये

 आँख के आँसू थमते नहीं है क्यों तुम इस तरह बहने लगते हो तुम हो मेरे दिल में बसे हुए बंद किये हुए आजद होने को इस तरह छलकते हो कभी तो होठों पर आकर बैठो खुल कर हँसो तुम संग मेरे मुझे भी हँसा दो सनम दिल खोलकर तुम मानो महक उठी हो सारी बगिया खिल गये हो फूल ही फूल गीत गाने लगी हो कोयल आम की डाल पर बैठकर पीपीहे की प्यास भी बुझती है बड़े प्यार से बुलाया गले लगाया अब तुम करो न मेरी  परवाह रखो मेरा ख्याल ओ सनम दिल खिला दे मेरा असीम