सावन
कल फिर रोया सावन
तड़प तड़प के रोया
तुमने जी दुखाया
बिन बात के सताया
कितना समझाया पर
मन समझ नहीं पाया
सोते हुए जगते रोया
खाते रोया पीते रोया
मचल मचल के रोया
तरस तरस के रोया
मजबूर था दिल के हाथों
किसी भी हाल दिल न बहला
आंखों के प पोटे सूज गए लाल लाल
गालों पर बहती रही लंबी लंबी धार
बिखर गए थे बाल चारों तरफ
जिस्म हो गया बेजान जार जार
बिस्तर से तन को उठाया ना गया
हाल मन का किसी से छुपाया ना गया
बेदर्दी निर्दई जालिम
क्या सुख पाया तूने
सता कर रुलाकर तड़पा कर
प्यास एक की तक तो
तुझ से पूछा या ना गया
दुनिया भर में तू बरसता फिरा
तब भी तू रह गया प्यासा का प्यासा
मुझसे भी कहीं ज्यादा
तरसता तड़पता मचलता हुआ
सीमा असीम
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