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Showing posts from July, 2020
यह सावन की बारिश  रिमझिम सी बूंदे  कितना रंग निखारा है  बारिशों ने इन पत्तों का  इन बूंटो का  मुक्त होकर मन चाहता है इन्हें  अपलक निहारना  बिसरा कर दुनिया  खोये रहना  किसी पंछी की तरह  उन्मुक्त हो बिचरने के लिए  आजन्म  देखते ही इन पत्तों को  इन रंगों को  लगता है जैसे सूरज ने  दिया है  नारंगी रंग  मृदु हवाओं ने दी है   महकती खुश्बू  चांद सितारों जाग कर कोमल आकार  से  नबाजा है  और शबनम ने नहलाया है  शब भर  ले लूँ बलाएं कि नज़र उतार लूँ  कि अब यह धरती झूम झूम के नृत्य करना चाहती है  सुरीली स्वर में श्रंगार गाना चाहती है  मन्नते दुआएं और आजादी के लिए आकुल   पिंजरे में कैद पंछी  देखना चाहता है  अपने पैरों पर पूरा आसमान उठाकर..... 

बेहद उदास

बेहद उदास और आंसू भरी आंखों के साथ मैं लिख रही हूं सच तो यह है कि कभी तुमने मुझे प्यार किया ही नहीं था और ना कभी समझा था प्यार को क्योंकि मैं पहले दिन से आज तक अकेले निभा रही हूं तुमने तो मेरी देगा सादा किया और मुझे छोड़ दिया रोने तड़पने मचलने के लिए अगर प्यार होता तो तुम दूसरी औरतों के प्रति कभी आकृष्ट नहीं होते कभी दूसरी औरत को हाथ भी नहीं लगाते अभी दूसरी औरतों के साथ रिश्ता नहीं निभाते उनकी महफिलों में साथ बैठते मुझे सच में आज दुख इस बात का है कि तुमने मुझे बुलाया फैसला आया और अपना ग्रास बनाया और ठीक वैसा ही तुमने दूसरी औरतों के साथ किया ताज्जुब होता है मुझे कि मैं तुम पर कैसे विश्वास करूंगी कैसे तुम्हें समझूंगी कितना बड़ा शब्द है कितना बड़ा उसका मजाक बना दिया खेल खेल दिया लानत है तुम पर., लानत है तुम पर मैं बार-बार यही शब्द कहूंगी लानत है तुम पर, एक जिस्म को पाने के लिए तुमने ऐसी धोखाधड़ी करें मेरी आत्मा कराहती है तड़पती आत्मा ,  कितनी दर्द से भरी हुई आंसुओं में डूबी हुई, तुमने मेरा फायदा उठाया है हर बार हर बार,, यह सब मैं नहीं कह रही मेरी आत्मा, मेरा दिल कह रहा है.... 
आज ऋषि को मैडम के ऊपर बहुत तेज गुस्सा आया हालांकि वह हमेशा उनकी बात मान लेती है जैसा वह कहती है वैसा ही करती है लेकिन जब उन्होंने उससे कहा कि साइकिल का कहीं से अरेंज कर लो तो उसे लगा कि मैडम हमेशा उस पर बटन डाल देती है इतना सारा आलू कैसे मैनेज करें इन सब चीजों को कहां से लाए साइकिल अगर है उसके पास साइकिल स्टोर रूम में पड़ी हुई है वह कितनी गंदी है उसको उठाकर निकालकर साफ करना और कितना टाइम जाएगा 2 घंटे का टाइम है बस मेरे पास उसमें मैं ना आराम कर पाऊंगी ना मैं खुद सोचो पाऊंगी ना मैं उसे अच्छे से प्ले को फिर कर पाऊंगी लेकिन मैडम को यह सब बातें कहां समझ आती है वह तो बस कह देती है और मैं कहने से मतलब है मैडम मुझसे नहीं हो पाएगा मैं आपको बोल रही हूं प्लीज 2 घंटे का टाइम है मैं कैसे कर पाऊंगी सब कुछ नहीं अब मैं घर पर कहूंगी भाई को या किसी को तो वह मेरी डांट लगाएंगे एक तो मैं कैसी तरह से समय निकालकर घर में सबको कह कर मना कर प्ले करती हूं आपकी वजह से और आप मेरे ऊपर हमेशा कोई ना कोई ऐसा वर्णन डाल देती है जिससे मुझे बहुत परेशानी होती है मैं मेंटली परेशान हो जाती हूं अपने अगर साइकिल निकालकर साफ करू...

उम्मीद

हम एक गिरे हुए शख्स से उम्मीद   करते हैं कि वो हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगा जबकि वो जाहिल और नींच इंसान हमारा फायदा उठायेगा और स्वार्थ पूरा होते ही हमें सिर्फ दुःख और आँसू देगा कि अब तू जिंदगी भर रो और हम मूर्खता वश उस कुत्ते के लिए रोते रहते हैं अपनी उम्मीदों को दिल से लगाये हुए....  सीमा 

मानसी... धारावाहिक कहानी

सुबह हो गई थी और मानसी की आंखों में नींद भर गई,  रात भर तो जागती ही रही थी ! कभी मोबाइल पर मूवी देखती या फिर फेसबुक, टुइटर यह सब चलाते हुए पूरी रात गुजार दी थी!  अपनी पीजी में वह बिल्कुल अकेली थी सारी सहेलियां,  उसके साथ रहने वाली रूममेट वे सब अपने घर चली गई थी मानसी नहीं जा सकी ! क्योंकि उसे हल्का बुखार था और उसे लगा अगर एयरपोर्ट पर उसका बुखार चेक हुआ तो कहीं वह फँस न जाए या फिर उसको कहीं क्वारंटाइन ना कर दिया जाए या फिर कहीं आइसोलेशन के लिए ना भेज दिया जाए !बस यही डर की वजह से वह रुक गई थी कि एक आध दिन में निकल जाएगी लेकिन अगले दिन से ही लॉकडउन लग गया और वह अकेली वही रह गयी !   उसे लगा था कि 1 दिन में बुखार तो उतर ही जाएगा और वह आराम से अगले दिन की फ्लाइट करवा कर निकल जाएगी भले ही ज्यादा पैसे जाए लेकिन घर पहुंच जाएगी, पर उस का सोचा हुआ पूरा नहीं हुआ! बुखार बढ़ गया था ! क्या करें? उसने अपनी मम्मी को फोन किया !   मम्मी ने उसकी आवाज से समझ कर लगा कि उसकी तबीयत सही नहीं है !  मुझसे पूछा क्या तुम सही हो मानसी?   हां मैं बिल्कुल ठीक हूं ! हल...
करीब चार महीने से कहीं भी आना जाना बंद है हम कहीं जा नहीं सकते और कोई हमारे घर आ नहीं सकता मुझे समझ नहीं आता कि मैं इतना परेशान और दुखी क्यों हूँ ?क्यों नहीं मन संभालता है ? क्यों हर समय मैं दुखी परेशान और उदास रहती हूँ ? क्यों किसी काम में मन नहीं लगता है ? क्यों रोना रोना और सिर्फ रोने का मन करता है ? मुझे लगता है यह स्थिति तो हर किसी के साथ होगी सभी लोग अपने अपने घरों में ही बंद हैं तो क्या वे सभी उदास परेशान और निराश हो गए हैं ? सब मेरी ही तरह से रोने को मजबूर हो गए हैं और यूं ही दुखी होकर रोते हैं और दिल भर जाने तक रोते रहते हैं ? अगर हाँ तो इसका क्या इलाज है ? यह कैसे सही होगा ? क्योंकि कभी कभी मन इतना परेशान होता है कि कुछ समझ नहीं आता, क्या करें ? कैसे करें कि यह पीड़ा कम हो जाये । हम अपने दुख कैसे किसी को बताएं ? कैसे कहें उनसे कि हम निराशा के दौर से गुजर रहे हैं और इस सब से उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है । 

वफ़ा

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इन उदास पलों में  खामोशियों को अपना साथी बना कर  मौन की चादर ओढ़ कर  इतनी जोर से चीत्कार करूं   कि गूंज जाए सारा आकाश धरती ब्रह्मण्ड   रो रो कर निकाल दूं मन की सारी भड़ास  सारे दुख सारे कष्ट बहा दूँ आंसुओं में  ईश्वर ने  दुनिया में इंसानों के रूप में   शैतान बनाए हैं  वफा के बदले में करते हैं हमेशा बेवफाई  उनकी बेवफाई को  कभी याद ना करूं   भुला दूं मैं सारी बेवफाई  बेवफा को नहीं मालूम वफा के मायने   झूठ झूठ हर बार झूठ  कैसे समझाऊं अपने मन को  कैसे मनाऊं मैं अपने मन को  हार जाती हूं थक जाती हूं  बार-बार हर बार  मुझे जीतना नहीं   मुझे हारना है   लेकिन तुम्हारे सच पर  तुम्हारी झूठ पर नहीं  तुम्हारे झूठ पर नहीं  सीमा असीम