यूँ ही तो नहीं होता अहसास 
कि मैं जी जाती हूँ 
या कभी मर सी जाती हूँ 
यूं ही तो नहीं फूट पड़ती हैं कोपलें  
कि बीज बोया तो होगा जरूर 
ये शब्द कैसे रचते रहते हैं तुम्हें 
कैसे बन जाती है 
कोई प्यारी सी प्रेम कविता 
कैसे गा उठता है मन 
कैसे मधुर राग बजने लगता है 
यूँ ही तो नहीं
रात भर झरती है ओस और 
सुबह सुबह 
चमक उठती हरियाली पर 
घास पर पत्तों पर 
नाच उठता है मन का मयूर जैसे 
नाचने लगता है मोर 
आकाश में घिरी घटाएं देखकर
सुनो प्रिय मैं रचती रहती हूँ तुम्हें 
दिन रात अपने प्रेम पगे मन से 
कभी तुम भी लिखो न 
अपने सच्चे अल्फ़ाजों में मुझे 
अपने दिल की कलम से ,,,
सीमा असीम 




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