कोई न रोके दिल की उड़ान को
दिल वो चला आ आ आ
सुनो प्रिय
सच तो यही है न कि मैं तुम्हें कभी याद ही नहीं करती लेकिन तुम हमेशा मेरी यादों में रहते हो मेरे मन में बस्ते हो और आँखों में समाये रहते हो ,,,अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ कैसे याद करूँ और कैसे भुलाऊँ ? सनम यह प्रेम है कोई खेत की मुली नहीं है कि जब मन किया तोड़ा और खा लिया
या फिर काट कर फेंक दिया इसको तो आग भी नहीं जला सकती बल्कि आग मेन तपकर और भी निखार ले आती है प्रेम को जीवन दे देती है फिर तुम कैसे समझ लेते हो कि जब मन में आया तो प्रेम कर लिया और जब मन में आया तो उसकी परवाह करना छोड़ दिया, याद भी नहीं किया कभी नाम भी नहीं लिया बस मुंह देखा प्यार किया नाम लेना भी छोड़ दिया हैं न प्रिय ? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारा नाम मेरे होंठों पर मिश्री सा घुलता रहता है हर पल आती जाती सांस के साथ जुबां पर रहता है ,,प्रिय तुमसे कैसे कहूँ कि जब कभी आईना देखती हूँ तो मुझे मैं कहीं नजर नहीं आती सिर्फ तुम ही तुम , हर तरफ और हर जगह तुम्हारा होना महसूस होता है तो भला बताओ मैं कैसे खुद को महसूस करूँ ,कैसे खुद को कहीं पाऊँ, कैसे मैं कहीं भी स्वयं का अहसास कर पाऊँ क्योंकि तुम सिर्फ आईने में ही नहीं बल्कि मेरे सोते जागते, हँसते बोलते, खाते पीते तुम होते हो और जो कुछ मैं कर रही होती हूँ वो तुम कर रहे होते हो ,, अब तुम ही बताओ मैं कहाँ रही ? कहाँ रहा मेरा होना ? हाँ प्रिय यही तो सच है और यही होता है मैं कभी चाह कर भी अपने आप को जी ही नहीं पाती बल्कि तुम्हें जी रही हूँ ,तुम्हें ही प लिया है मैंने, इस कदर डूब गयी हूँ मैं ,, तुम्हारे भीतर इतनी गहराई में उतर गयी हूँ जहां कुछ और है ही नहीं तुम्हारे सिवाय ! अब तुम ही बता दो कि मुझे कि मैं कैसे खुद को पाऊँ ? कैसे महसूस करूँ  खुद को ? कैसे खुद के अहसास जी सकूँ ? है कोई तरीका , बोलो बताओ , यह मेरे बहते हुए आँसू , ये मेरे चेहरे की उदासी सब तो तुम्हारे होने के गवाह है फिर कैसे खुशी को जी सकूँ मैं ,हाँ मैं जी सकती हूँ हंसी ,खुशी , प्रेम ,और उल्लास को जैसे खिलखिला कर हंसु मैं जब तुम मुस्कुराने का मुझे मौका दोगे तभी तो न जब तुम थोड़ा सा भी मुस्कुरा दोगे मैं खुश हो जाऊँगी ,मैं हंस पड़ूँगी क्योंकि तुम्हारा परछवाँ मेरे चेहरे पर होता है न सच में प्रिय , बिलकुल सच है यह और हे ईश्वर यह सदा सच ही रहे ,,सच का कभी दूसरा रूप न उभरे जैसे तुम्हारा सच मुझे कभी झूठ लगता है और तुम्हारा झूठ सच लगता है ,समझ ही नहीं आता मुझे कुछ ,लाख कोशिश कर लो कोई फाइदा ही नहीं होता सिर्फ सोचती ही रह जाती हूँ समझ नहीं पाती क्योंकि मैं प्रेम में दिल को ही लगा पाती हूँ दिमाग का इस्तेमाल नहीं करती, कभी सोचती ही नहीं प्रेम को दिमाग से , प्रेम दिमाग का होता ही कहाँ हैं प्रिय ,प्रेम तो सरल हृदय वालों के लिए होता है और सरल लोग ही प्रेम को निभा पाते हैं उसका आनंद ले पाते हैं , चालाक चतुर लोग प्रेम का मर्म कैसे समझ पाएंगे कैसे उसके दर्द को संभाल पाएंगे , कैसे अपने भीतर ही दर्द की नदी को बहने से रोक पाएंगे ,,हैं न प्रिय ,,,,
बहुत सरल नहीं है सरल होना
कठिन लोग भला कैसे सरलता का अर्थ जानेंगे ???
सीमा असीम
8,11,19

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