मेरी पलकों पर ख्वाब हैं या है
भार तेरे होने का
रहने दो इन ख्वाबों को सदा मेरी
झुकी पलकों पर
हाँ प्रिय सुनो
यह जो मेरी झुकी झुकी सी पलकें हैं न ,इन पर तुम्हारे होने का सबूत है जिस कारण मेरी
मैं बड़े प्यार से सहेजे रहती हूँ अपनी पलकों पर बैठे तुमको ,, क्या तुम्हें पता है कि सच यही है सिर्फ यही एक सच है इस मेरी दुनिया का ,,कोई दूसरा न कोई सच है न कोई झूठ है और इसीलिए मुझे पसंद है सच को हमेशा सच
बनाए रखना ,,मैं जानती हूँ कि मुझे अपने हिस्से के सच को संभाले
रखना है बाकी तुम अपना खुद ही सोचो कि सच कितना और झूठ कितना , क्योंकि मैं चाहती हूँ तुम्हें कभी
मेरे सामने अपना सिर झुकाकर कर खड़ा होना पड़े या शर्मिंदा होने पड़े ,,तुम्हारा सम्मान मेरा सम्मान है तभी तो तुम्हें गलत कहता है मुझे वही शख्स
गलत लाग्ने लगता है और मैं उससे तुम्हारे लिए लड़ पड़ती हूँ और उससे इतना दूर हो जाती
हूँ कि फिर कभी वो मुझे तुम्हारे बारे में कुछ कह न सके !
तुम भी तो ऐसा ही करते होगे न
, हाँ जरूर करते होगे ,बस
एक बात हमेशा ध्यान में रखना कि तुम्हारे बारे में कभी कोई बात किसी दूसरे मुंह या
अंजान व्यक्ति के द्वारा न सुनने को मिले ,कभी भी ऐसा मौका मत
आने देना ,प्रिय जब मेरे दिल में कोई भेद नहीं है तो तुम क्यों
रखते हो या रखने की कोशिश करते हो जबकि मैं तुमसे अलग नहीं हूँ बिलकुल भी अलग नहीं
मैं तुम हूँ और तुम मैं ,यही हकीकत है मानों या न मानों ,,,
मैं जानती हूँ कि तुम चाहते हो
मैं तुमसे अपने मन की हर बात कहूँ और तुम्हारी सुनू लेकिन तुम्हारा जो छोटा सा अहम
है न वो बीच में आ जाता है और तुम उसमें अटक जाते हो जबकि प्रिय प्रेम में कोई भेदभाव
नहीं होता है नाम मात्र का भी नहीं अगर है तो प्रेम नहीं है ,,सोचो वहाँ प्रेम कैसे होगा जहां विश्वास नहीं
है, एतबार नहीं सच में वहाँ प्यार भी नहीं है ! क्या तुम समझते
हो मैंने माला के मनके की तरह अपने प्रेम को कच्चे धागे में पिरो कर रखा है और वो कच्चा
धागा इतना मजबूत है कि हजार हथियों के बल से भी नहीं तोड़ा जा सकता लेकिन जरा से अविश्वास
से वो टूट कर मनका मनका बिखर जाएगा और लाख समेटने की कोशिश करोगे नहीं सिमटेगा ! प्रिय
बस इस कारण ही मैं अपने विशवास की डोरी को कभी लेस मात्र भी झटका नहीं देती सिर्फ अपनी
भारी और झुकी पलकों को अपनी नाम आँखों से और भी ज्यादा नम कर लेती हूँ या जार जार रोती
हूँ बहा देती हूँ अपने मन का मैल और पहले से भी जायदा निखरी संवरी नजर आने लगती हूँ
एकदम पहाड़ों से निकलती गंगा जैसी शुद्ध और निर्मल ,,लेकिन प्रिय
तुम कभी भी अपनी आँखें नम मत होने देना , कभी अपनी पलकें मत भिगोना, नहीं तो यह बोझिल हो जाएंगी और बोझिल पलकें अक्सर झुकी हुई ही होती हैं ...
यह हमारे दिलों के रिश्ते यूं
ही नहीं बने हैं सनम
कि रब की मर्जी है यह तो और प्रेम
में डूब गए !!
सीमा असीम
16, 11, 19
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