है अब तो कुछ सुखन का मेरे कारोबार बंद
रहती है तब अ सोच में लैलो-निहारबंद
दरिया सुखन की फिक्र का है मौजदार बंद
हो किस तरह न मुंह में जुबां बार-बार बंद
जब आगरे की ख़ल्क का हो रोज़गार बंद
जितने हैं आज आगरे में कारखाना जात
सब पर पड़ी हैं आन के रोज़ी की मुश्किलात
किस-किस के दुख को रोइये और किसकी कहिये बात
रोज़ी के अब दरख़्त का मिलता नहीं है पात
ऐसी हवा कुछ आके हुई एक बार बंद
Comments
Post a Comment