अपनी ही नजरों में न गिरना कभी ओ मेरे सनम फिर  दुनिया भला कैसे पलकों पर बिठाएगी तुम्हें सुनो  सनम        न जाने  कैसे तुम साँस ले पाते होंगे ?  कैसे तुम जी पाते होंगे ? न जाने कैसे तुम अपनी नजरों से आईने में खुद को देख पाते होंगे ? क्योंकि तुम्हारे जीवन का कोई भी मूल्य नहीं है ,,,न ही तुम्हारी कोई वेल्यू ,,,अगर होती तो तुम कभी भी इस तरह की हरकतें नहीं करते ,,न ही कभी मेरी आँखों में आंसू भरते ,,काश तुम्हारे दिल में भी उतनी ही सच्ची भावना होती ,,,काश तुम्हारा  मन भी पानी की  तरह से निर्मल और साफ होता क्योंकि प्रिय प्रेम में कोई भेद नहीं होता और जहाँ भेद है वहां प्रेम नहीं है ,,,,मेरी नजर में प्रेम में शरीर नहीं होता है लेकिन तुम्हारे लिए तो प्रेम में सबसे अहम् किरदार शारीरिक सुख ही है तभी तो तुम अपनी तृष्णा मिटा कर खुश हो जाते हो ,,,तुम कैसे समझ सकोगे प्रेम की आत्मीक गहराई को  .... आत्मा की पवित्रता को। ..प्रिय प्रेम इतना पवित्र बंधन होता है जिसे किसी भी अबलम्बन की जरुरत नहीं होती है ,,,न तन की , न भाषा की और न ही साथ की ,,,सच्चा प्रेम अपनी अनकही भाषा में ही सब कह लेता है और जहाँ तक पहुंचना  चाहिए वहां पहुंचा भी देता है ,,,,हे ईश्वर मेरे प्रेम की पवित्रता हमेशा ऐसे ही बनाये रखना और अगर तुम अपवित्र हो तो अपना साया भी मुझ पर न पड़ने देना ,,,,,,और उसी तकलीफ से गुजरना जिस तकलीफ में तुमने मुझे डाला है तब शायद अहसास हो कि प्रेम किया नहीं जाता बल्कि निभाया जाता है । मेरी आँखों के आंसू थमते नहीं हैं , मेरी आँखों में धुंधला पन भर गया है, फिर भी तुम्हे अब कभी कुछ  नहीं कहूँगी क्योंकि  मन में पाप है और तुम पापी,,,,फिर भी मैं तुम्हें  ही बेइंतिहां चाहूंगी ,,, सिर्फ  तुम्हें   ही ,,,
कोई मेरे तन को छू नहीं पायेगा अगर किसी ने छूने की कोशिश की तो उसका हाथ जल जाएगा ,,,,,मैं अपने वादे  पर यूँ ही अडिग रहूंगी झूठी दुनिया की  तरह अपने रंग नहीं बदलूंगी ,,,,,  ... रात सरक न तू यूँ ही ठहरी रहे कि लिखनी है मुझे रात भर अपने दर्द  की कहानी ,,,,सीमा असीम ५ ,१० ,१९ 

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