ओ सनम जब भी तुमको पुकारा है मैंने
तुम नजर आए हो सदा मेरे सामने
सनम
सुनो प्रिय
अशकों के गहरे में सागर डूबा हुआ मेरा मन बिलकुल
भी उबरना ही नहीं चाहता और गहरी तलहटी में उतर कर वह ढूंढ लाने को उतावला हो जाता है
जो मेरी पकड़ में है लेकिन हाथ से फिसल गया था और उस एक पल की कीमत उसके साथ साथ मेरा
मन भी चुका रहा हैं इतनी ज्यादा तकलीफ दर्द घुटन और बेचैनी देता है कि जान ही खींच
लेता है मानों जीवन ही खत्म हो जाता है न जीते बन पाता है और न ही मरते हुए ही तब मुझे
सच में समझ नहीं आता कि गलती किसकी है अगर तुम्हारी तो मुझे सजा क्यों ? आखिर किसलिए इतनी तकलीफ होती है मुझे ? सनम मुझे बस इतना बता दो कि मेरी सच्चाई में और निष्ठा में कोई कमी रह गयी
थी या मैंने सच्चा प्यार किया उसकी सजा दी है मुझे ...सनम प्रेम कोई पल भर का साथ नहीं
है यह तो आजीवन निभाया जाने वाला बंधन है जो बिना बंधे ही बंधा रहता है इसमें कुछ कहने
की जरूरत नहीं होती कोई शब्द कभी कुछ नहीं कहते बल्कि बिना कहे ही सब कह देते हैं सिर्फ
अहसास ही हमें सब बता जाते हैं ,,,हमारा दिल ही काफी है किसी
को प्यार करने के लिए ,,,प्रेम में दिल ही तो काम करता है और
जहां दिमाग होता है वहाँ पर प्रेम होकर भी प्रेम नहीं होता वो एक खेल या व्यापार बन
जाता है ,,,,सनम तेरे प्रेम में उतनी ही दीवानी हूँ जितनी कोई
पगली अपने पागलपन में खुशियाँ पाती है और मैं पागल ही तो हूँ अपने प्रेम के पागलपन
में ......और यूं ही सदा बनी रहूँगी जैसे मैं अभी हूँ या जैसी मैं कल थी ...न मैं बदलुंगी
न ही मेरा प्रेम बदलेगा चाहें दुनिया बदले या तुम बदल जाओ सब कुछ बादल जाए वैसे प्रिय
तुम कभी नहीं बादल पाओगे जब मेरा सच्चा प्रेम तुम्हें याद आएगा हाँ सनम ये मेरे अश्क
यूं ही नहीं आते यही तो मेरे सच्चे प्रेम की निशानी हैं जो हरदम मेरी आँखों में भरे
रहते हैं पर तुम्हें सामने पाते ही हवा बन कर आसमा में उड़ जाते हैं और आँखों में अनोखी
चमक ,,लबों पर मुस्कान और दिल में ढेरों खुशियाँ भर जाते हैं
,,,,जिस्मानी प्रेम नहीं है तुमसे यह तो वह अहसास है जो तुम कहीं
भी रहो तुम्हारे साथ ही रहेगा ....
वो पल जो हमने साथ में गुजारे
हाथों में लेकर हाथ देखे नजारे
पूरा समर्पण रहेगा मेरा हमेशा
ओ मेरे सनम ओ मेरे प्यारे ...
सीमा असीम
2, 10,19
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