तुझे पुकारु या न पुकारु तू हंसेशा सामने रहता है  
ओ मेरे सनम तुझ पर ही मेरा दिल कुर्बान रहता है ,,,,
सुनो प्रिय
     आज मन बहुत उदास था और बहुत दुखी भी क्या तुम्हें कभी मेरी याद आती भी है या नहीं अगर आती है तो मुंह से कह दिया करो हमेशा मन मे क्यों रखते हो ? कह क्यों नहीं देते ? कभी कहने भी नहीं देते हो ...सनम सुनो जब किसी से प्यार करता है मन तो फिर हरदम उसके ही साथ रहता है उसे ही जीना चाहता है और उसकी खुशी मे ही खुशी पा लेता है फिर तुम मुझे क्यों कभी कभी दुख के भँवर मे डूबा देते हो किसलिए खुशियों को आहूत कर देते हो ? क्यों आँखों में अशकों की माला पहना देते हो ? बताओ न मुझे ,,,,मैं जानना चाहती हूँ ,,क्योंकि मुझे खामोशी बहुत चुभती हैं, बहुत ही ज्यादा कष्ट देती हैं और दर्द के गहरे गर्त में डुबो देती हैं ....तब मैं जी नहीं पाती हूँ ....और सच कहूँ तो मैं जीना नहीं चाहती हूँ तब ....साँस भी नहीं लेना चाहती हूँ ,,,लेकिन प्रेम की जो जोत मेरे मन में जल रही है वो मुझे निराशा की हर लहर से बाहर निकाल लाती है और मैं मुस्कुरा देती हूँ रोते रोते हंस देती हूँ ताकि तुम्हारे चेहरे की मुस्कान बनी रहे ....तुम भी मुस्कुरा सको लेकिन प्रिय तुम मेरे प्रेम का मज़ाक मत बनने देना ,,वैसे तुमसे कहना भी क्या ,,,तुमने मज़ाक तो बना ही दिया है और कितना बनाओगे और कितना तकलीफ में घेर दोगे ...
तू है और तू यूं ही रहेगा तुझसे क्या गीला करना
तेरी तो हर बात ही  है ...

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