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Showing posts from September, 2019
b   कुछ लिखूँ मैं तुम्हें कि प्यार का पैगाम भेज दूँ शिकवा करूँ या प्रिय सिर्फ तेरा नाम लिख दूँ ... सुनो प्रिय चाहत कि नदी में बार बार डुबती हूँ तैर जाती हूँ पार लगकर भी उबर नहीं पाती हूँ और गहराई में उतर जाती हूँ ,,,, उन लम्हों को ख्यालों में जीते हुए कभी मुसकुराते हुए तो कभी आँखों से नमी छलकाते हुए ...सनम तुम मुझसे दूर जाकर भी दूर कहाँ होते हो बल्कि और भी ज्यादा करीब आ जाते हो , ऐसे जैसे मेरी रूह के साथ बांध जाते हो क्या तुमको पता भी है कि तुम खुद में बिलकुल नहीं बचे हो ,, मुझमें ही समा गए हो पूरी तरह से ,,, बस तुम स्वयं को न जाने कैसे समझ पाते हो खुद से ही बिछुड़ कर या दूर होकर ,,, सनम जब तुम मेरे पास हो फिर मेरे मन में यह कैसी बेचैनी घर कर लेती है ,, कैसी तड़पन ,,, कैसी तलब जाग जाती है कि तुम्हें अपने सीने से चिपटा लेने को जी चाहता है ,, तुम्हें चूम लेने को जी चाहता है ,,, तुम्हारी आँखों में एकटक देखते रहने को जी चाहता है और तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर खो जाना चाहता है ,,, तुम्हारे चौड़े से सीने पर टिकाकर अपना माथा तुम्हारी धड़कनों को सुनना चाहता है , जिनसे निकलती रहती है...
न दर्द ठहरता है  न आँसू रुकते हैं मेरे ये कैसा दुःख  आया है कि जाता ही नहीं !! कभी कभी ये समझ नहीं आता है कि आखिर तुम्हें किस बात की कमी थी ? कौन सी वो अधूरी चाह थी जो तुम संभल नहीं पाए ! तुम्हें तो कभी  कोई कमी नहीं रही,  जिसकी तुमने ख्वाहिश की थी, सब दिया मैंने  फिर ऐसा क्यों किया ? क्यों मुझे बर्बाद किया और किसलिए मुझे आग के दरिया में पिघलने को धकेल दिया ? सनम तेरा दिल भी  रोता होगा जितना मेरा रोता  है ,तेरे भी आंसूं  बहते होंगे, जैसे मेरे नहीं रुकते हैं ,काश तूमने कोई  वादा न किया होता , काश तुमने सच्ची वफ़ा की कसमें न खाई होती ,काश कि तेरी नियत में खोट नहीं होता ! खैर क्या हो सकता है तुम्हे अपनी कही बातों का ख्याल आता होगा तो  अपनी नजरों में गिर जाता होगा,  तुम्हे भी लगता होगा क्या कहा था और क्या किया ,,,,,पता नहीं लगता भी होगा या नहीं हर  तरह से मुझे बर्बाद करने वाले खुदा के बन्दे सच बता तुम्हे नींद तो आ जाती है, तुम्हे कभी सकूँ तो आता है, तुम्हे अपनी गलतियों का अफ़सोस तो होता है न। .... क्योंक...
ये कैसे बुझे मन की प्यास  ये आग कैसे बुझेगी  तू जब है सिर्फ मेरा    तो दर्द की लहर कैसे आई  सुनो मैं तुमसे कुछ भी कहना नहीं चाहती न सुन्ना चाहती हूँ मैं सच में अब इतना थक गयी हूँ कि अब तुम्हारे साथ चलने का मन ही नहीं करता फिर भी खुद को घसीट सा रही हूँ तुम्हारे साथ कदम ताल मिलाते हुए चल रही हूँ निरंतर जिससे तुम्हारी चल में कोई रूकावट न आये क्योंकि तुम्हारी चाल थमी तो शायद मेरे मन को अच्छा नहीं लगेगा बल्कि बेहद दुःख का अहसास होगा जो मुझे कभी खुश नहीं रहने देगा वैसे देखा जाए तो मैं आज भी खुश नहीं हूँ इसका कारण मैं तुम्हे ही मानती हूँ तुम ही हो मेरे दुःखों का कारन ,हाँ हाँ तुम ही , तभी तो तुम्हारा ख्याल और तुम्हारी यादें पल भर को भी मेरा पीछा नहीं छोड़ती और मैं उन यादों में उलझ कर इतना तड़पती हूँ कि तुम्हें इसका अहसास तक नहीं होता और तुम जानबूझ कर मुझे दर्द घुटन और तकलीफ दे देते हो  ,पता है प्रिय जब तुम मुझे तकलीफ दर्द घुटन और कष्ट देते हो न तब तुम मुझसे भी ज्यादा तकलीफ में होते हो ,मुझसे भी ज्यादा दर्द झेलते हो , फिर क्यों होता है ऐसा या क्यों करते ...
इतने अरमान इतने ख्वाब और इतनी ख्वाहिशें थी मन में मेरे  पर अब मन भरा भरा लगता है मेरी आँखों की तरह। ..  सुनो प्रिय , क्यों हैं मेरी आँखों में आंसू इतने और क्यों हरदम मन परेशान रहता है न जाने क्यों मन कोई बात समझता ही नहीं है कुछ भी नहीं तुम्हारे लिए कुछ गलत सोचते हुए भी बहुत गलत लगता है क्यों दिल डूबा डूबा रहता है जैसे किसी अथाह सागर की गहराइयों में डूब गयी हूँ और वहां से बाहर आने का कोई रास्ता ही नहीं है लाख कोशिशों के बाद कोई सच्चा या पक्का किनारा ही नजर नहीं आता है हर तरफ झूठ गलत का मकड़ जाल की तरह उलझी और फंसी हुई  न उबरने का रास्ता और न ही सुलझने का रास्ता , यार तुमसे तो कोई भी बात कहने का भी कोई मतलब नहीं कोई  भी सवाल जो मैं तुमसे करुँगी वो मुझे मेरी नजरों में पहले गिरा देगा तुम तो क्या समझोगे इस सच्चाई  को या फिर इस सच को जो तुम करते हो या करते आये हो वो तुम मुझसे कभी भी छिपा नहीं पाओगे भले ही पूरी दुनियां से छिपा लो कुछ भी कह कर उन्हें बहला लो बरगला लो लेकिन तुम मुझसे एक तिनका भर भी नहीं छिपा पाओगे क्योंकि तुम मेरी नस नस में बसे हो लहू बनक...
यह चाहत की कैसी सजा पाई है हमने कि दिल हर नस बहुत दुखती है    सुनो प्रिय               कहना चाह कर भी कह नहीं पाती हूँ मन की  हर बात मन में ही रखे रह जाती हूँ कितना दर्द और कितनी तकलीफ से भर जाती हूँ ,,,क्या तुम जानते हो इस तकलीफ को, समझते हो न कि मन के अहसासों और भावनाओं का क़त्ल कर देना कितनी तकलीफ देता है, मुझे लगता है कि तुम जान बुझ कर समझना नहीं चाहते या फिर मुझे दुःख देकर तुम्हें ख़ुशी मिलती है तभी तो तुम अनजान बनने की कोशिश करते हो लेकिन अनजान नहीं रह पाते हो , वो कौन सी तकनीक है जो तुम मेरी पीड़ा को बिना कहे सुने ही समझ जाते हो और फिर आ जाते हो सामने ,हाँ खड़े हो जाते हो आकर सामने और फिर उन तकलीफों को सहते हुए दर्द से आँखों में बहते आंसुओं को पोंछ देते हो और इतने प्यार से सहला देते हो कि सरे दुःख दर्द पल भर में छूमंतर हो जाते हैं न जाने कहाँ हवा हो जाते है रह जाती हैं तो सिर्फ  खुशियाँ, मुस्कुराते  हुए लव और चमकती हुई आँखें \~        सच में प्रेम में ऐसा ही होता है अगर प्रेम सच्चा हो तो क्योंकि...
 ये मन की कैसी लगी है न  जानी न समझी कभी सुनो न प्रिय                  तुम्हें सोचती हूँ तो भी मन भटक जाता है तुम्हे नहीं सोचती तब भी मन भटका रहता है आज भी पूरा दिन मैं बीएस तुम्हें सोच सोच कर परेशां होती रही कि तुम्हें मैं कभी समझ नहीं पाई और जितना समझने की कोशिश की उतना ही जयादा उलझती चली गयी जितना मैंने उबरने की कोशिश की उतना ही मैं और डूबती चली गयी सच में बहुत ही अजीब है यह रीत यह दुनिया की जिसमें सब अपने मन के होते हैं सबको सिर्फ अपनी ही परवाह होती है वो कभी किसी के बारे में जरा सा भी नहीं सोचता उसके बारे में भी नहीं जिसने अपनी जान की बाजी लगा दी अपनी सारी खुशियां लुटा दी खुद दर्द को अपने से लिपटा  लिया और किसी भंवर में फंस गयी जिसमें सिर्फ कांटे ही कांटे हैं जो हर पल चुभते है टीसते  और बेपनाह तकलीफ देते हैं लेकिन क्या करें अब यही जीवन में रह गया है ,,,दर्द सहते रहो और अपने मुंह को बंद रखो कुछ कहा तो बुरा होगा कुछ गलत हुआ या तुम्हें बुरा लगा तकलीफ हुई तो मेरी जान ही निकल जायेगी और अगर यूँ नहीं  तो म...