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Showing posts from February, 2018
दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है  इस दर्द की दवा तुम हो प्रिय सिर्फ तुम सुनो प्रिय  आज मन बहुत उदास है बहुत ज्यादा उदास है किसी भी काम में मन ही नहीं लग रहा है घबराहट से भरा मन सब कुछ छोड़ कर भाग जाना चाहता है क्या तुम भी उदास हो ? क्या तुम्हारा मन नहीं लग रहा है ? प्रिय यह क्यों हो रहा है मुझे कैसा आभास हो रहा है ? क्या कुछ गलत हो रहा है जो मुझे तकलीफ से भर रहा है .... इतनी पीड़ा ...इतना कष्ट ....नहीं पता क्यो और किसलिए ? तुम क्यों जाते हो ? तुम क्यों जाना चाहते हो ? तुम क्यों भटकते हो ? आखिर क्या पा लोगे ? क्या मिल जाएगा तुम्हें ? क्या तुम मुझे दर्द दुख तकलीफ देकर खुश रह सकते हो ? मेरे बहते हुए आँसू और भी ज्यादा बह रहे हैं ...प्रिय तुम मुझे साथ में ही रखा करो ...क्यों करते हो क्षण भर को भी दूर ....क्यों आखिर क्यों मेरे प्रीतम .....आ जाओ तुम अभी इसी वक्त ....फिर कभी मत जाना ...आज पता है मन इतना घबरा रहा था कि मैं यूं ही घर से बाहर निकल गयी थोड़ी देर को खुली हवा में टहलने को .....थोड़ी देर को शायद मन बहल जाये ....प्रिय मैं बस एक बात पुछना चाहती हूँ कि तुम जानते हो...
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ये तो घर है प्रेम का ............ सुनो प्रिय                तुमसे अब कुछ भी कहने का दिल ही नहीं चाहता ,,,कुछ कहना ही नहीं चाहता है,,,,, मेरा मन इस कदर भरा हुआ है कि आँखें लबालब है जो हर समय बरस पड़ने को आतुर रहती है ......जितना भी रोती हूँ उससे भी ज्यादा रोने को जी चाहता है .....बस एक बात समझ नहीं आती है कि आखिर तुम ऐसे कैसे हो गए ? तुम ऐसे कैसे बन गए ? क्या खूबी थी उसमें जो उस राह पर चल पड़े ? क्या तुम्हारी अंतरात्मा यह सब बिना किसी तकलीफ के स्वीकार कर लेती है ? क्या तुम्हें कोई भी फर्क नहीं पड़ता ? यह मेरी शिकायत या फिर कोई गिला नहीं है बल्कि मेरा प्रेम है जो तुम्हें भटकने से बचाना चाहता है सिर्फ इतना सा ही और कुछ भी नहीं ? जब मेरे समर्पण में कोई कमी नहीं तो और क्या ज्यादा पाने की चाहत ......प्रिय मैं सच कह रही हूँ एक दिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होगा, मैं भी नहीं ............हाँ प्रिय यही एक सच है और सबसे बड़ा सच .........मैं अपना प्रेम अपने अंतस में कहीं छुपा लूँगी ....कहीं भी क्योंकि प्रेम का मतलब ही नहीं तुम ...
होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएंगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है? राय साहब ने हाथ बाँध कर कहा-हाँ सरकार, होली है। बुल- खूब लाल रंग खेलता है? राय साहब- हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार है। साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बु...
कीमत थप्पड़  रोज शाम बगीचे में घूमने जाना उनकी आदत में शामिल था |  आज उनके साथ मे मिश्रा जी भी थे    कुछ देर टहल कर उनसे बतियाने लगा | शिवरात्रि का पावन दिन पहला था | आज कुछ विशेष रौनक थी | कुछ एक गुब्बारे-कुल्फी वाले भी आ जुटे थे | मिश्रा जी से बतियाते हुए आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े एक  कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा : "बाबूजी पैसे" ?  मैं हतप्रभ: "कैसे पैसे" ? उसने पास खड़े कुल्फी खाते एक बच्चे की तरफ़ इशारा कर के कहा : "आपका नाम ले कुल्फी ले गया है, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे" |  मुझे गुस्सा आ गया बच्चे के पास गया और दो थप्पड़ जड़ दिए और कहा "मुफ्त की कुल्फी खाते शर्म नही आती" ? वह बोला : "मुफ्त की कहाँ ? इसके बदले थप्पड़ खाने के लिए तो आपके पास खड़ा था वरना भाग ना जाता"?
प्रेम लघुकथा मेहंदी लड़के ने धीमी होती रेल की खिड़की के बाहर देखा तो लगा साक्षात चाँद धरा पर उतर आया हो| अलसी भौर में उनींदे नयन सीप | अपलक देखता ही रह गया | कुछ संयत हो, हाथ में पानी की केतली ले उतरा और वहां चला, जहाँ वह मानक सौंदर्य मूर्ति जल भर रही थी | फासला कम होता गया, सम्मोहन बढ़ता गया | समक्ष पहुँचने तक दोनों के मध्य स्मित अवलंबित नजर सेतु स्थापित हो चुका था | भावनाओं का परिवहन होने लगा | लड़के ने देखा लड़की की पगतली पर महावर रची थी | किसी परिणय यात्रा की सदस्या थी | बालों से चमेली की खुशबू का ज्वार सा उठा, लड़का मदहोश हो गया | कलाई थाम ली, हथेली पर रचे मेहंदी के बूटों पर अधर रख दिये | लड़की की पलकें गिर गई | तभी लड़की के पास खड़ा पानी भरता एक मुच्छड़ मुड़ा | अग्नि उद्वेलित नजरों से घूरा और अपने हाथ को लडके की कनपट्टी की दिशा में घुमा दिया | लड़का झुका और स्वयं को बचाया | इतने में उसकी ट्रेन खिसकने लगी | वह लपक कर चढ़ गया | दूसरी तरफ़ उनकी की ट्रेन भी चल पड़ी | वह मुच्छड़ के साथ घसीटती सी चली | गति पकड़ती ट्रेन की खिड़की से एक मेहंदी रची हथेली हिल रही थी |...
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मैं इतनी ज़ोर से नाची आज  कि घुंघरू टूट गए !!   बिछा दो राह में बस फूल ही फूल  कि साजन घर आ गए हैं  सुनो प्रिय,             कोई जरूरी तो नहीं है न कि तुम चाहों मुझे उतना ही कि जितना मैं तुम्हें चाहती हूँ .....जरूरी तो नहीं कि निभाओ तुम उतनी ही वफा कि जितनी मैं वफा निभाती हूँ ,,,,,,हाँ प्रिय बहुत काफी है मेरा चाहना ही तुम्हें क्योंकि प्रेम कभी मांगा नहीं जाता, कभी पाया नहीं जाता सिर्फ देने का नाम ही तो प्रेम है,, लूटा देना अपना सब कुछ अपने प्रिय के नाम पर बस यही प्रेम है ,,,,,प्रेम के लिए बर्बाद कर देना मिटा देना बिना किसी स्वार्थ के कि प्रेम है है यह कोई सौदेबाजी नहीं है कोई व्यापार नहीं है .....मेरे प्रिय तुम तो मानसिक रूप से हरदम मेरे साथ ही रहते हो क्योंकि मैं पल भर को भी तुमसे दूर जाती ही नहीं जोड़े रखती हूँ अपने मन का तुमहरे मन से बंधन ,,,,जग के समाज के बंधन वाले बंधन की मेरे प्रेम को दरकार ही नहीं है ..........कर का मनका छोड़ के अब मन का मनका फेरती रहती हूँ प्रिय आपके लिए अपनी जान नियोछावर किए रहती ...
डुबाया है इस कदर मुझे सनम आपकी मोहब्बत ने  उबरने का सोचती भी हूँ तो कुछ और डूब जाती हूँ ! रग रग में जो बहता है वो तो लहू है मेरे सनम  आँख से बहने वाले इस दर्द को मैं क्या नाम दूँ !!  सुनो प्रिय             आज इतने दिनों के बाद एक एक शब्द जोड़ कर तुम्हें लिखने का दिल किया है ॥....न जाने क्यों लगता है जैसे कि तुम सिर्फ मेरे हो ,,,,,,दिल से आवाज आती है कि तुम मुझे उतना ही प्रेम करते  हो जितना मैं करती हूँ लेकिन यह फांस की तरह से क्या दिल में चुभता रहता है प्रिय यकीन जानों यह बहुत दर्द करता है बहुत तकलीफ देता है ,,,,मेरे प्रिय क्या इस तकलीफ को तुम भी महसूस करते हो ?मैं इस दर्द से निजात तो नहीं पाना चाहती हूँ परंतु इस दर्द के साथ जीना तो मरने से भी बदतर है, समझ ही नहीं आता है कभी कभी कि क्या मैं जीवित भी हूँ या नहीं ?  मरने के समान जीते हुए भी मैं तुम्हें खुश देखकार पल भर को जी उठती हूँ और फिर उसी अवस्था में आ जाती हूँ ..............सारी रात उस चमकती हुई हरी बत्ती को देखते हुए गुजारती हूँ और दिन तुम्हारा मनन करते हुए ......प्र...
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हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ........ सुनो प्रिय,                 मैं सिर्फ इतना जानती हूँ कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ बस और कुछ भी नहीं ,,,,इसके सिवा कुछ और जानने समझने की चाहत भी नहीं है न ही कभी होगी ,,,मैं तुमसे कल भी उतना प्रेम करती थी और आज भी उतना ही ....मेरे लबों पर कल भी तुम्हारा नाम था ,,,, आज भी है और कल भी रहेगा ,,,आँखों में नमी और दिल में दुआएं भी वैसी ही हैं ,,मेरी बाहें आज भी उसी तरह से तुम्हें अपनी बाहों में भरने को उतावली रहती हैं और एक झलक पाने को आँखें हरदम इंतजार करती हैं ,,,मैं सिर्फ इतना ही जानती हूँ कि तुम मेरे प्रेमी हो और मैं तुम्हारी प्रेमिका ......कल भी कुछ और जानने की तमन्ना नहीं थी और न ही आज ॥न कभी होगी ही ,, बस इतना रहम तुम भी करना मुझे कुछ बताने समझाने की कोशिश मत करना क्योंकि मैंने अपने सच्चे दिल से तुम्हें चाहा और तुम्हें पाया फिर कैसी किसी और बात की गुंजाइश बची ,,,,,तुम्हें पा लेना ही मेरे सच्चे प्रेम का सूचक है मेरी सच्चाई है ,,,.... मेरे दिल की गहराइयों में ब...