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पतझड़

 पतझड़ तो चला गया है दुम दबाकर  बसंत ने अपना साम्राज्य फैला दिया है  दस्तक दे दी हैआहिस्ता से  गर्मी ने  सूरज की किरणों ने व्याकुल कर दिया  पशु पक्षी के साथ साथ हम इंसान भी  तपती  धूप से बचने को छाया की  ओट तलाशने लगे हैं  मौसम की मार ने सदा गरीबों और  निरीहों को ही अपना शिकार बना लिया  !!! सीमा असीम  ३०,4,२४

मुक्तक

 मुस्कुराते हुऐ हर ग़म को छुपा लेते हैं   चाँद तारों को अपना दर्द बता देते हैं   कर लेते हैं बात बड़ी ख़ामोशी से हम   तुम्हें यूँ ख्वाबों ख़्यालों में सजा लेते हैं!! सीमा असीम  29,4,24

तुम

 तुम भी मुझे यूँ ही सोचते होंगे  ढलती शाम को मचलते होंगे  नहीं पाते होंगे चैन भीड़ में भी  एक झलक पाने को तरसते होंगे  सीमा असीम  27,4,24
 सुरमई शाम में तुम याद बनकर चले आते हो  जब रात होती है तो ख्वाब में चले आते हो  रोशन है मेरा तन मन तुम्हारे प्रेम की खातिर   सुबह आती है तो किरण बनकर चले आते हो   यूं ही सदा आते हो तुम जाते तो हो नहीं कभी   फिर क्यों मैं तुम्हें कहती हूं तुम बिरहा दे जाते हो..
 तुम चाहें किसी भी तरह से मुझे परेशान करो  याद करके या फिर भुलाकर   हर स्थिति में स्थिति में है मैं तो सिर्फ   तुम्हारे ही मन में हूं और तुम्हारी बातों में भी हूं   भले ही उन बातों को तुम कभी किसी से कह नहीं पाते हो सुन नहीं पाते हो   खुद ही खुद मन ही मन दोहराते रहते हो, कहते रहते हो और सुनते भी रहते हो  बस यही तो प्रेम है सीमा असीम 

पिता के हाथ के निशान

 पिता के हाथ के निशान ================   पिता जी बूढ़े हो गए थे और चलते समय दीवार का सहारा लेते थे। नतीजतन, दीवारें जहाँ भी छूती थीं, वहाँ रंग उड़ जाता था और दीवारों पर उनके उंगलियों के निशान पड़ जाते थे।मेरी पत्नी ने यह देखा और अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों के बारे में शिकायत करती थी। एक दिन, उन्हें सिरदर्द हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपने सिर पर थोड़ा तेल मालिश किया। इसलिए चलते समय दीवारों पर तेल के दाग बन गए। मेरी पत्नी यह देखकर मुझ पर चिल्लाई। और मैंने भी अपने पिता पर चिल्लाया और उनसे बदतमीजी से बात की, उन्हें सलाह दी कि वे चलते समय दीवारों को न छुएँ। वे दुखी लग रहे थे। मुझे भी अपने व्यवहार पर शर्म आ रही थी, लेकिन मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। पिता जी ने चलते समय दीवार को पकड़ना बंद कर दिया। और एक दिन गिर पड़े। वे बिस्तर पर पड़ गए और कुछ ही समय में हमें छोड़कर चले गए। मुझे अपने दिल में अपराधबोध महसूस हुआ और मैं उनके भावों को कभी नहीं भूल पाया और कुछ ही समय बाद उनके निधन के लिए खुद को माफ़ नहीं कर पाया। कुछ समय बाद, हम अपने घर की पेंटिंग करवाना चाहते थे।  जब पेंटर आए, तो मेरे...

बारिश

 आज मौसम की पहली बारिश हुई  तेज हवाएं चली और बदल ले आई   कल घने पानी भरे हुए बादल  चले आए लहराते हुए   मचलते इतराते और इठलाते हुए   बरस गए झूम कर   और भिगो गए मेरा मन   तब याद आए तुम   बहुत याद आए   क्या तुम बारिश बन कर चले आए   मुझे भिगोने के लिए  आंगन को गीला करने के लिए  हां तुम ही तो थे जो बारिश बनकर आए   और छूकर बरस कर दुखी मन को सुख में बदल गए  मौसम की बारिश और तुम याद आए  सीमा असीम  24,4,24