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साथ तुम्हारे

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 ख़ुशी के पलों को याद करने से  ख़ुशी लौट आती है  यह मैंने किसी से सुना था  बस इसलिए ही  मैं याद करती हूँ  उन चंद पलों को जब मैं साथ साथ थी  धुंधलकी शाम थी  चाँद भी आसमान में आधा था  और नदी का किनारा था  पर हम पूरे थे  क्योंकि खुश थे  बहुत खुश  साथ तुम्हारे.... सीमा 
 बेवफाई तो मात्र एक शब्द है क्योंकि अगर प्रेम होगा तो वह हमेशा रहेगा ना कभी जाएगा और ना कहीं छूटेगा न टूटेगा वह बना रहेगा वैसा का वैसा ही मन में खिलता हुआ  मुस्कुराता हुआ  क्योंकि प्रेम कभी कहीं जाता नहीं है तो वही तो वही रहता है हमें लगता है कि प्रेम चला गया या वह रूठ गया या वह बेवफा हो क्या ऐसा कुछ नहीं होता है क्योंकि प्रेम को हमारे मन का स्थाई भाव है जो कभी खत्म हो ही नहीं सकता यह अलग बात है कि उसमें कुछ कभीज्यादा हो जाये...
सुबह सबेरे हाथ में छोटा सा थैला पकडे धीरे धीरे चली आती है अब जिस्म में उतनी जान नहीं है फिर भी वे अपनी गाडी खींचती रहती हैं बड़ी सफाई से बर्तन धोती है पोंचा बैठ कर लगता नहीं है      

माई री

 माई री किससे कहूँ अपने हिया की पीर  सच मे  माँ कभी कभी मन इतना ही दुखी होता है कि कुछ समझ नहीं आता है, कहाँ चली जाऊं ? कैसे मन को समझाऊं ?पता है अपनों की कही हुई बात सबसे ज्यादा दुःख देती है , जब हमने सुनी तब मुझे समझ आया कि कैसे कैसे दुःख बर्दास्त करने पड़ते हैं,  जब हम अपने माँ बाप से दूर चले जाते हैं लेकिन फिर भी एक आस रहती कि जब जायेंगे और माँ से मिलेंगे तो कुछ बातें कह सुन कर मन को हल्का कर लेंगे लेकिन जब माँ ही हमें छोड़कर कहीं दूर ईश्वर के पास चली जाएँ तब हम अपने मन को कैसे ढाढस बधाएं? कैसे इस दुःख से पार पायें, फिर उसके बाद और सब लोगों की बातें, गुस्सा, नफरत जब अकेले ही सहने पड जाएँ तब तो बड़ी मुश्किल होती है !  माँ तुम खुश रहना खूब खुश, सारे स्वर्ग तुम्हारे चरणों में पड़े रहें और तुम किसी महारानी की तरह रहना, हमारा तो मन यूँ ही पागल है जरा सी बात पर दुखी हो जाता है फिर कोई जरा प्रेम से बोलेगा, सब सही हो जाएगा , माँ खूब सुख से रहना ...... प्यारी माँ  4,4,24 

आस की डोर

आज फिर हुआ मन उदास  कहीं फूल झर न जाएँ  मुश्किल से आई है बहार  यह दिन यूँ ही गुजर न जाएँ  यक़ीनन मैं तुम्हें याद करती हूँ  फिर क्यों निराश होती हूँ  मिल ही जायेगा नदी को रास्ता  बस प्रार्थना बार बार करती हूँ  मुझे नहीं मालूम है यह कि  दिन आजकल इतने लम्बे क्यों हैं  न जेठ का महिना न  गर्मी के दिन  फिर यह जिन्दगी बेलोस क्यों है  खैर छोडो बेकार की दुनियादारी  प्रेम की राह पर चल पड़ी हूँ  कुछ मिले न मिले परवाह नहीं  आस की डोर थामे खड़ी हूँ ...... सीमा असीम  १, 4,२४ 

मूरख

तुम क्या जानों प्रेम  अगर जानते तो कभी भी  मुझे मूरख न कहते  तुम अपनी बुद्धिमत्ता से आंकते रहे मुझे  और मैं बनी रही मूरख  लेकिन यकीं जानों  मैंने प्रेम के उस चरम को पाया है  जो तुम कभी महसूस ही नहीं कर सकते  अब न बची कोई चाह  न कोई इच्छा  न कोई अभिलाषा  कि मैंने जिया है सच्चे प्रेम को  तुम्हें पाकर ........... सीमा असीम  ३०.३,२४