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उम्मीद

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 जब हम किसी से उम्मीद रखते हैं  और ज़ब वे  पूरी नहीं होती तो  हम उदास हो जाते हैं निराश हो जाते हैं  हताश हो जाते हैं और दुख के सागर में डूब जाते हैं  पर हम ऐसा कभी सोचते ही नहीं कि अगर यह उम्मीद हमने अपने आप से रखी होती  फिर हम उसे पूरा कर रहे होते तो  हमें कितनी खुशी मिलती तब  ना हमारे मन में निराशा होती  न हताशा  होती  ना उदासी होती और ना ही हमारे पास होते दुःख परंतु हम ऐसा करते ही कहाँ है  हम तो सिर्फ दूसरों से ही अपेक्षाएं रखते है दूसरों की तरफ़ ताका करते हैं  कभी अपने मन की गहराई में उतर कर देखो कि  तुम क्या पाना चाहते हो किस बात से ख़ुशी मिलती है  और फिर उसे पाने के लिए शिद्दत से जुट जाओ  देखो कैसे पूरे नहीं होते तुम्हारे सारे ख्वाब  कैसे नहीं पूरी होती मन की सारी अपेक्षाएं लेकिन करो जो भी उसे सच्चे मन से करो फिर वह सब कुछ पा जाओगे जो  तुम पाना चाहते हो... सीमा असीम 7,1,21

पुकार

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 जब मेरा दिल पुकारता है तुम्हें शिद्दत से तो मेरी आवाज तुम तक पहुंच जाती है   फिर तुम भूल कर सारी दुनिया की बातें  खींचे चले आते हो मेरी तरफ  कुछ और याद नहीं रहता है तुम्हें  मेरे सिवाय  क्योंकि कहते हैं ना कि  दिल की आवाज दिल तक जाती है  कोई भी उसे फिर रोक नहीं सकता  यह मामला है दिल का  इसमें दुनिया क्या कर लेगी  कुछ भी नहीं कर पाएगी  फिर चाहे अंजाम कुछ भी हो  कोई भी फर्क नहीं पड़ता लेकिन पुकारना सदा अपने सच्चे मन से और सच्चे दिल की पुकार कभी जाया नहीं जाती   क्योंकि यह बात है दिलों की.. सीमा असीम 6,1,21

मुस्कान

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 हमारी छोटी सी मुस्कुराहट इतनी सारी परेशानियों को दूर कर देती है  फिर भी हम मुस्कुराना भूल जाते हैं  दुनिया की आपाधापी में  दुखी रहते हैं गम में  उदासी में उलझन में फंसे रहते हैं   मुस्कुराते कैसे हैं याद ही नहीं आता  लेकिन जब कभी कोई अपना  अचानक से आकर हाल पूछ लेता है  या प्यार के दो बोल कह देता है  अपने होने का एहसास करा देता है  दुनियादारी से दूर  मुस्कुराहट की दुनिया में धकेल देता है  हां सच में मुस्कुराना जीवन में एक औषधि की तरह काम करता है आपके सारे गमों को दूर कर देता है  सारे मर्जो की एक दवा है मुस्कान  और यह आती है अपनों के होने से अपनापन का एहसास दिलाने से....  सीमा असीम 5,1,21
 वो प्रेम की बात करता है कितना खाली है वो प्रेम से वो प्रेमिकाओं के नाम गिनाता है कितना दूर है वो प्रेमिकाओं से वो भागता है भटकता है सबके पीछे कितना तन्हा है वो उसे सच्चे साथी की तलाश है वो कितना झूठ है खुद करना चाहता है सब अपने नाम पर क्या कुछ नहीं है उसके पास क्यों करता है फिर वो बड़ी बड़ी बातें ज़ब इतना सा भी नहीं है उसके पास सुन खुदा के बंदे न बन तू इतना स्वार्थी...

प्रेम

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 अगर कोई तुमको अच्छा लगता है या किसी से तुमको प्रेम है तो थोड़ा रुको थोड़ा ठहरो लेकिन वक़्त गुजर जाए उससे पहले ही तुम उससे  कह दो क्योंकि वक्त तो गुजरता रहता है और जो साथी तुम्हें मिला है वह तुम्हें फिर मिले ना मिले क्योंकि इस दुनिया में  कोई किसी का इंतजार नहीं करता देखो न इस दुनिया में वक्त भी कहाँ करता है कभी किसी का इंतजार वक़्त अपने वक़्त पर गुजर जाता है बिना किसी की परवाह किये... सीमा असीम 4,1,21

हमारी सोच

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 हमारी सोच पर आधारित होती है हमारी दुनिया हम जैसे सोचते हैं दुनिया में वैसी ही नजर आती है इसलिए हम दुनिया को तो नहीं बदल सकते लेकिन अपनी सोच तो बदल सकते हैं  हम जैसा ही सोचना  शुरू करेंगे  वैसा ही हमें सब कुछ  नजर आने लगता है क्योंकि जैसी हमारी दृष्टि होती है वैसे ही हमारी सृष्टि बन जाती है.... सीमा असीम 4,1,21

रिश्ते

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 रिश्ते होते हैं निभाने के लिए और निभाने से ही रिश्ते बनते हैं अपनी खुशियां स्वार्थ के लिए बनाए गए रिश्ते कभी आपको भी खुशी नहीं देंगे ना आपको कभी सुख देंगे ऐसा ही मानना है,... लोग आजकल करते ही ऐसा है कि अपनी खुशी के लिए अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए रिश्ते को बनाते हैं और फिर उन्हें छोड़ देते हैं जब उनका स्वार्थ पूरा हो गया तो उनका रिश्ता खत्म ऐसे रिश्ते बहुत दुख देते हैं बहुत तकलीफ देते हैं खुद को भी और अपनों को भी जो आपके साथ जुड़े हुए होते हैं जो आपके अपने होते हैं....... सीमा असीम 2,1,20