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गतांक से आगे   सुनो मेरे प्रिय             मैं हर बार तुम से हार जाना चाहती हूँ॥ हर बार मिट जाना चाहती हूँ॥ हर बार खत्म हो जाना चाहती हूँ क्योंकि मेरा हार जाना तुम्हें सुख देता है न और तुम्हें सुख देने के लिए तो मैं कुछ भी करती हूँ ..और कुछ भी करूंगी जब तुम कभी भी भूले से भी आवाज देते हो तो मैं सुन लेती हूँ ... कहीं से भी और कभी भी क्योंकि मैंने तो अपना ठिकाना ही वहीं पर बना लिया है जहां पर तुम्हारी धड़कने धड़कती हैं ....जब चाहें जैसे चाहें महसूस कर लेना ...बस मुझे इन दुनियावी बातों से हमेशा दूर रखना... मैं किसी भी तरह से प्रेम को दिमाग से सोच ही नहीं पाती और मेरे प्रिय मैं कभी सोचना भी नहीं चाहती ...बस एक दिल ही है मेरे पास और वो भी तुम्हारे हवाले कर दिया ....अब तुम जो चाहें ॥जैसे चाहों ॥ वैसे करो मैं खुश हूँ ,,,हर हाल मे खुश हूँ ,,,बस तुम्हारा साथ बना रहे ॥ अहसास बना रहे और तुम सदा खुश रहो .. .सुनो प्रिय, देखो प्रकृति कैसे झूम उठी है खुशी से .....वो देखो आसमां भी चमक उठा है तारों से झिलमिलाता हुआ .... राह देख ...
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जुलाई का महीना था। बसंत ऋतु अपनी जवानी पर थी। बेरोना नगर के एक कुलीन परिवार से मान्टेग्यू के घर पर Dance party का आयोजन हुआ था. यह रोमियो का अपना घर था.  नृत्य के अवसर पर केपुलेट परिवार की जूलियट भी रोमियो के घर आयी हुई थी. इसी नृत्य के दौरान दोनों की आंखें चार हो गयीं और हृदय की गहराई में उतर गयी.रोमियो अपने को रोक न सका. वह जूलियट के घर जाकर उसके निजी कक्ष में पहुंचकर अपने आंतरिक प्रेम का उससे इजहार किया. जूलियट भी रोमियो पर फिदा थी. वह उसे पाने के लिए तड़प रही थी, किन्तु दोनों परिवारों के बीच वर्षों से चली आ रही शत्रुता से रोमियो और जूलियट की शादी संभव नहीं थी, ऐसी परिस्थिति में प्रेमी युगल ने अपने–अपने परिवारों को बिन बताये चुपके से एक गिरजाघर में जाकर वहां के एक अधिकारी के समक्ष गुप्त रूप से शादी कर ली, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों परिवारों के बीच जंग छिड़ गई. लड़ाई में रोमियो के एक करीबी दोस्त की मौत हो गई. बदले में रोमियो ने भी जूलियट के चचेरे भाई की हत्या कर दी. रोमियो को देश से बाहर जाने की सजा मिली. इसी बीच जूलियट के पिता ने उसका विवाह पेरिस के काउन्ट के साथ...
मेरे प्रिय आपके लिए आपका आना, दिल धड़काना मुस्करा के, यूं शरमाना प्यार आ गया रे तुझ पर प्यार आ गया क्यूं होता है दिल दीवाना आज ये हमने जाना प्यार आ गया रे, तुझ पर प्यार आ गया आपका आना दिल धड़काना डाल के दाना मुझे सताना प्यार आ गया रे, तुझपरप्यारआगया मिली जो नज़र, हुआ ये असर ये दिल गुम हुआ, अरेओ बेखबर छुपी है शरारत तेरे प्यार में दिल हार बैठे पहली बार में पल में अपना क्यूं हो जाता है कोई अपना कैसे बन जाता है  प्यार आ गया रे, तुझ पर प्यार आ गया तेरे प्यार का, नशा छा गया मिली वो सज़ा, मज़ा आ गया बातों ने तेरी जादू किया बन बैठा तू मेरा पिया प्यार आ गया रे,तुझ पर प्यार आगया.... बहुत याद आते हो प्रिय तुम बहुत याद आते हो .....कि कब हम रूबरू होंगे कि कब हम रूबरू होंगे .....
मुक्तक वे आते हैं यूं जैसे  कोई बयार मझे चूमकर चली जाती है  वे आते हैं यूं जैसे छोटी सी बदली बरसने को मचल जातीहै  नीम की पत्ती सरसराती हुई जैसे दुबक जाती है आगोश में वे आते हैं यूं जैसे मिट्टी भी सुगंधित होकर महक जाती है !! सीमा असीम
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गतांक से आगे  यूँ पलकों में आँसु और दिल में दर्द सोया है, हँसने वाले को क्या पता, वो चैन से सोया है  सुनो प्रिय ,,,मैं नहीं जानती कि यह अश्क कहाँ से चले आते हैं ...बहते हैं ...और बहते ही रहते हैं ....बिना थमें ,,बिना रुके ...न जाने कहाँ से चली आती है ये मुस्कान और ज़ोर से ठट्ठा मार कर हंस देती हूँ बिना किसी बजह ,,बिना किसी बात ,,कहीं भी ,,,कभी भी ॥कभी नींद यूं उड़ जाती है कि लाख कोशिश के भी नहीं आती और कभी यूं भी होता है कि कितनी भी जागने की कोशिश करो उठा ही नहीं जाता ...प्रिय ये कैसा प्रेम है क्या ये सच का प्रेम है ,,नहीं जानती ,,मैं सच में नहीं जानती ॥ बस इतना पता है कि यह प्रेम मेरी जान लेता है .... आसमा से उतर आती है धवल चाँदनी सी रोशनी अमावस्या की रात में भी और शीतल कर देती है मन को ....कहीं कोई अंधेरा नहीं ,,, कहीं कोई गम नहीं ....बस बुझाती हूँ चराग और जला लेती हूँ ,,,,,,इस तरह अपने मन को बहला लेती हूँ ....मिलते कहाँ हैं इस जहां में कहीं कोई सच्चा हमदम ....मिल भी जाये तो वो कहाँ समझते है ... प्रिय तुम अपनी धड़कनों पर अपना हाथ रखकर देख लेना ...और महसूस कर लेना .....
जब तुम आ जाते हो ,, बोलते बतियाते हो ,,,,गम न जाने कहाँ चले जाते हैं....उदासी मुस्कराती है और  खामोशियाँ किसी कोयल की तरह  से कुहकने लगती हैं तुम चूम लेते हो आगे बढ़कर मेरा माथा ,,,,तन मन  झूम उठता है लहरा कर ॥प्रीति प्रेम का यह रिश्ता है प्रिय ...हमसे है ,, हमारे प्रेम से है बिना किसी चाह के बंधा हुआ है जिसके फंदे तुमने कस कस के लगाए हैं कोई लाख कोशिश करे न कभी टूटा है और न कभी कोई तोड़ पाएगा .... सीमा असीम
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गतांक से  आगे  न जाने क्या हुआ है मुझे आजकल ? मैं नहीं जानती ,,लेकिन मैं परेशान सी हूँ ,,बहुत दुखी सी ...न जाने क्यों ऐसा लगता है... जैसे सब गलत हैं ...सब झूठ हैं ,,, न जाने क्यों किसी पर विश्वास ही नहीं... किसी पर भरोसा ही नहीं ...इस दुनियाँ में अब मेरा दिल नहीं लगता ॥मैं इस दुनियाँ को छोड़ कर उस दुनियाँ में जाना चाहती हूँ ॥जहां न छल हो ...ना कपट हो ...सब को सबसे प्रेम हो ,,,किसी को किसी से नफरत न हो ...कोई किसी को दुख न दे ...मैं मर जाना चाहती हूँ ...मेरी आत्मा कराह उठती है ...ये कैसी तकलीफ है / प्रिय मुझे इस कष्ट से निकालो ,,,प्रिय मुझे जीना है अभी ... इस तरह नहीं मरना चाहती ,,, हम अगर प्रेम करते हैं तो क्या गलत है ,,क्या प्रेम को खामोश कर सकते हो ? क्या इसके प्रवाह को रोक सकते हो ? कितनी बन्दिशें लगाओगे ? कितने रास्ते बंद करोगे ? प्रिय तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ? क्यों ? आखिर क्यों ? मेरे प्रेम को अभी और कई मुकाम पार करने है और बुलंदियों तक पहुँचना है ...प्रिय मेरा प्रेम ,,, घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे वो तो प्रेम न होय ! अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिए सोय !! मेरा दिल हर प...