गतांक से आगे सुनो मेरे प्रिय मैं हर बार तुम से हार जाना चाहती हूँ॥ हर बार मिट जाना चाहती हूँ॥ हर बार खत्म हो जाना चाहती हूँ क्योंकि मेरा हार जाना तुम्हें सुख देता है न और तुम्हें सुख देने के लिए तो मैं कुछ भी करती हूँ ..और कुछ भी करूंगी जब तुम कभी भी भूले से भी आवाज देते हो तो मैं सुन लेती हूँ ... कहीं से भी और कभी भी क्योंकि मैंने तो अपना ठिकाना ही वहीं पर बना लिया है जहां पर तुम्हारी धड़कने धड़कती हैं ....जब चाहें जैसे चाहें महसूस कर लेना ...बस मुझे इन दुनियावी बातों से हमेशा दूर रखना... मैं किसी भी तरह से प्रेम को दिमाग से सोच ही नहीं पाती और मेरे प्रिय मैं कभी सोचना भी नहीं चाहती ...बस एक दिल ही है मेरे पास और वो भी तुम्हारे हवाले कर दिया ....अब तुम जो चाहें ॥जैसे चाहों ॥ वैसे करो मैं खुश हूँ ,,,हर हाल मे खुश हूँ ,,,बस तुम्हारा साथ बना रहे ॥ अहसास बना रहे और तुम सदा खुश रहो .. .सुनो प्रिय, देखो प्रकृति कैसे झूम उठी है खुशी से .....वो देखो आसमां भी चमक उठा है तारों से झिलमिलाता हुआ .... राह देख ...