हिंदी कविता
जो मैं तुम्हें बार-बार याद करती हूं
मैं यूं ही तो नहीं तुम्हें स्मृतियों में रखती हूँ
कुछ तो बात होगी जरूर
कुछ तो इसका कारण है अन्यथा
मैं क्यों तुम्हें याद करूं
मैं क्यों तुम्हारी बात करूं
क्यों मैं तुम्हें लिखूं और
क्यों मैं तुम्हें पढ़ूं
मैं तुम्हें ही पढ़ती हूं
रात हो या दिन
हर पल में
हर क्षण में
सिर्फ मैं तुम्हें ही याद करती हूं
तुम्हारी ही बात करती हूं
मन ही मन तुम्हें दोहराती हूं और
फिर उसे कागज पर उतार देते हैं
की मन बहुत बेचैन है
कि मन को चैन ही नहीं है
एक पल भी
तुम्हारे बिना जीने को तैयार ही नहीं होता
जैसे जैसे रात गहराती जाती है
तुम्हारी याद और ज्यादा
और भी ज्यादा बढ़ती जाती है
यह अंधेरा मेरे मन को और जागृत कर देता है
और तुम्हारी यादों से रौशन कर देता है
तुम भी ऐसे ही करते होंगे
शायद तुम भी मुझे यूं ही याद करते होंगे
और मेरी रोशनी से जगमगाते रहते होगे
जैसे कि मैं तुम्हारी रोशनी से जगमगाती हूं
चमकती हूं और
दूर से ही नजर आ जाती हूं
वैसे मैं
न जाने क्यों इतना प्यार करती हूँ
तुमसे ही तो
हां सिर्फ तुमसे ही....
सीमा असीम
10,6,26

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