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सनम हरजाई
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कैसी जमी है थोड़ी सी नमी है छल छल छलकती है बरसात आंखों से एक तेरी कमी है यह तेरी कमी है ज़ब यादों का बबंडर सीने में उठता है दिल फिर किसी हाल नहीं संभलता है तू हरदम साथ होने का अहसास देता है तो मन क्यों मेरा इतना मचलता है तू लग जाये आकर मेरे गले से हर शय से बस यह दिल दुआ करता है पोछ देना मेरे बह बह कर सूखे हूए आँसू लेकिन यह बता तू क्यों इतनी सजा देता है मेरे मर्ज़ को बढ़ाकर तू मुझे मार देता है सनम कहूं तुझे या हरजाई कह दूँ बनाता ही क्यों है ज़ब बार बार मिटा देता है... सीमा असीम 21, 10, 20
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कोरोना वायरस के कारण देश की अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा गयी थी। लग रहा था कि अपना विकासशील देश लुढ़ककर अविकसित देश की गोद में जा बैठेगा। सरकार परेशान थीं। ज्यादातर राज्य की सरकारों ने फल/सब्जी/केमिस्ट और पंसारी की दुकानें खुलवा रखी थीं। लेकिन अर्थ व्यवस्था की डूबती नैया को इन तिनकों से उबारना अब मुश्किल लग रहा था। अचानक सरकार को जाने क्या सूझी! उसने नशेडिय़ों के सिर पर देश की अर्थ व्यवस्था का भार लादने की ठान ली। शराब प्रेमियों ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अर्थ व्यवस्था को अपने कंघे पर मजबूती से धरा और आगा-पीछा देखे बिना ही दौड़ पड़े। लड़खड़ाकर यहाँ - वहाँ गिरे / पड़े, शौकीन और बेसुध लोग सच्ची मायने में बैसाखी साबित हुए।
अपना सा
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जब उससे बार-बार बात करने को जी चाहे जब वह बात करे तो हमें गुस्सा आ जाए जब बात ना करें तो मेरा दिल घबराए कैसे अनजान से रिश्ते में मन बंधा बंधा जाए दूर कोई चमकता सितारा आपके मन में समा जाये कभी मुस्कुराने को जी चाहे, कभी मिलने को अंजाना कोई, अपना सा लगने लग जाए सच में कुछ समझ में ना आए कभी समझ में ना आए.... सीमा असीम 15 10 20
जिंदगी
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जिंदगी आईने की जैसी होती है जब आप मुस्कुराते हो यह भी मुस्कुरा देती है जब आप रोते हो तो यह भी रो देती है जब कभी हो जाते हो आप उदास तो इसके चेहरे पर भी उदासी छाने लगती है इसलिए जिंदगी को खुद के अनुसार जियो अपने में खुश होकर जियो आप अगर खुद में खुश होकर जीते हो तो आपको कभी किसी से कोई उम्मीद ही नहीं होती दूसरों से उम्मीद करना मतलब जीवन में निराश हो जाना... सीमा असीम 12, 10, 20
खुशियाँ
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जब अपने हो साथ जब अपने साथ होते हैं तो हमें मिल जाती हैं अनगिनत खुशियाँ सुख और शांति छोटी छोटी प्यारी प्यारी अपनों की बातें हमें यादगार पलों से नवाज़ देती हैं जब कभी तेज हवाएँ चलती हैं तो मन घबरा जाता है लेकिन यही हवाएँ हमें मंजिल का पता देती हैं धीरे धीरे गुजर जाता है वक्त हम सोचते रह जाते हैं कभी इसमें व्यस्त कभी उसमें लगे हुए दुनिया की रस्में निभाते हुए भूल जाते हैं खुद को अपने सपने अपनी उम्मीदें सब कर देते हैं दरकिनार जीवन जी ही नहीं पाते और न अपने लिए कभी कुछ कर पाते हैं मन की खुशी क्या है कभी जान ही नहीं पाते कभी तुम सोचना अपने लिए भी अपनी खुशियों के लिए भी कि सच क्या है झूठ क्या है और क्या है जीवन को जीने का सच्चा अर्थ ॥ सीमा असीम 7, 10, 20