तुम ही हो जिंदगी अब तुम ही हो !! न जाने क्यों ऐसा लगता है कि जैसे तुम मेरे हो सिर्फ मेरे और मैं तुम्हारे चेहरे को गौर से देखती रहती हूँ पल भर को भी पलक झपकाने का दिल नहीं करता है लेकिन प्रिय फिर ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं अकेले ही तुम्हें निभा रही हूँ मैं ही सिर्फ वफा किए जा रही हूँ और तुम्हें तनिक भी फिक्र नहीं होती ? हो सकता है यह मेरा भ्रम हो लेकिन यह भ्रम भी क्यों है ? किसलिए आखिर ? लाख कोशिश के बाद भी मैं नहीं समझ पाती हूँ ! बस मैं इतना जानती हूँ कि जब मैं एकनिष्ठ भावना के साथ तुम्हें प्रेम करती हूँ तो तुम भी तो मेरी ही तरह मुझे प्रेम करते हो न ? प्रिय तुम जानते हो न, समझते हो न कि प्रेम करना तो बहुत आसान है लेकिन इसे निभाना बहुत ही मुश्किल है बहुत ही कठिन है शायद यह बजह हो कि तुम मुश्किलों से घबरा जाते हो ! मैं तो बस यूं ही सदा तुम्हें प्रेम करती रहूँगी और वफा को निभाती रहूँगी अपने सच्चे मन से ! बहुत ही कठिन डगर है पनघट की लेकिन चलना है मुझे इसी तरह ध्यानमगन होकर ! खुद को बिसराकर ! सिर्फ तुममें ही लीन होकर ! मैं मैं न रही मैं तुम बन गयी और तुम्हारे सारे दुख मेरे ...
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आप के प्यार में हम सवरने लगे देख के आप को हम निखरने लगे इस कदर आप से हम को मोहब्बत हुई इस कदर आप से हम को मोहब्बत हुई टूट के बाजुओं में बिखरने लगे आप जो इस तरह से तड़पाएँगे ऐसे आलम में पागल हो जाएँगे वो मिल गया जिसकी कब से तलाश थी बेचैन सी इन सासों में जन्मो की प्यास थी जिस्म से रूह में हम उतरने लगे आप के प्यार में हम सवारने लगे !!
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साँसों की डोर महक उठती है अमृत की रसधर बह उठती है कीचड़ में जैसे कमल खिला हो जब होता है प्रिय साथ तुम्हारा !! \सुनो प्रिय जो मैं तुम्हें लिखती हूँ न, तो सनम मैं सिर्फ लिखती भर नहीं हूँ बल्कि मैं जीती हूँ तुम्हें ! पल पल हर पल में ! क्या तुम्हें भी यही अहसास होता है जो मैं महसूस करती हूँ ? क्या तुम भी मुझे यूं ही जीते हो जैसे मैं तुम्हें जीती हूँ ? लेकिन प्रिय मुझे इन सब बातों से तनिक, रत्ती भर मात्र भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं खुद पर बिशवास करती हूँ मैं जानती हूँ कि मैं प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में .....सिर्फ तुम्हें जीते हुए ही अपने दिन रात गुजरती हूँ मेरे प्रिय तुम समझते हो बस इतना ही काफी है कि मेरो चाहत को दरकार यही है और कुछ भी नहीं ! तुम मेरे हो या नहीं इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता ! मैं हार चुकी हूँ अपना सब कुछ तुम्हारे प्रेम में ....... हर चोट से मैंने खुद को मजबूत किया है हर ज़ख़म को दिल पर महसूस किया है निभाई है हरहाल अपने हिस्से की सच्चाई मैंने सनम प्रेम सिर्फ त...
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मैं अक्सर सोचती हूँ की कोई भी पुरुष किसी भी महिला को चीट करते वक्त यह क्यों नहीं सोचता कि ऐसी ही महिलाएं बहने मेरे घर में भी हैं ! क्या सच में उनके दिल में एक महिला की कोई इज्ज़त नहीं या उसकी भावनाओं की कोई कदर नहीं ! कैसे और किस तरह वो उसकी भावनाओं को कुचल देता है कैसे खुद को हाबी करने के लिए उसे दबा देता है ? बस ऐसे ही प्रश्नों पर आधारित हमारी कुछ रचनाएँ हैं जिन्हें साझा करेंगे .......क्रमशः असीम
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नमन के दादा और दादी ने अपने जवानी के दिनों को याद करके का सोचा। उन्होंने फैसला किया कि हम फिर से दरिया के किनारे मिलेंगे जहाँ हम पहली बार मिले थे। दादा सुबह जल्दी उठकर तैयार होकर गुलाब लेकर पहुँच गए पर दादी नहीं आयी। दादा जी गुस्से में घर पहुंचकर बोले,"तुम आयी क्यों नहीं, मैं इंतज़ार करता रहा तुम्हारा?" दादी ने भी शर्मा के जवाब दिया,"माँ ने जाने ही नहीं दिया।" नमन हैरान ........
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न कोई है न कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा तुम देना साथ मेरा ओ हमनवाज ओ मेरे हमनवाज सुनो प्रिय मैं तुम्हारी हूँ और सिर्फ तुम्हारी ........बस तुमसे एक ही गुजारिश है मेरे प्रिय कि तुम कहीं भी रहो , कहीं भी जा बस खुश रहो हमेशा मुस्कुराओ मुझे बहुत अच्छा लगेगा ,,,,,, हाँ प्रिय तुम मेरे हो सिर्फ मेरे ही लेकिन मेरे लिए तो तुम्हारा होना भर ही काफी है ,,,,,, तुम्हें देख लेना ही मेरे लिए खुशी का कारण बन जाता है ,,, मैं उदासी में भी मुस्कुरा देती हूँ मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं खून का बहाव तेज हो जाता है और मेरे बेजान से जिस्म में जान आ जाती है मेरे प्रिय मेरी सारी खुशियां सिर्फ तुमसे हैं और शायद दुख भी.................प्रिय क्या तुम जानते हो कि जब तुम सामने से दिख जाते हो तो दिल को एक अलग से किस्म का सकूँ आ जाता है मेरी बेचैनी घबराहट परेशानी और तकलीफ़ें न जाने कहाँ छूमंतर हो जाती हैं ....न जाने कहाँ बिला जाती हैं ? भले ही तुम मुझे देख पा रहे हो या नहीं फिर...