एक लेखक होने से पहले हमने जी बचपन को जिया था उसे बचपन में ही तो हमें लेखक होने का यह हमारे लेखन को मजबूती प्रदान कर दी थी क्योंकि अगर हमने वह बचपन नहीं किया होता तो क्या आज में इस मकान तक पहुंचती या मैं इस तरह से रचनात्मकता को अपने जीवन में उतार लिया होता शायद नहीं क्योंकि हमारा बचपन ही हमारे पूरे जीवन की नींव तैयार करता है तो मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरा बचपन सबसे प्यारा बचपन था हालांकि सबको अपना बचपन बहुत प्यार होता है और सबको अपने बचपन से प्यार होता है हर कोई अपने बचपन में वापस लौट भी जाना चाहता है लेकिन मेरा बचपन कुछ अलग था कुछ हटकर था और सबसे अच्छा था जब मैं छोटी थी तो मुझे एहसास हुआ कि मैं इतना अच्छी मां क्योंकि मैं अपने घर में सबसे छोटी थी मेरे बड़े-बड़े भाई बहनों की तो शादी भी हो गई थी और दो भाई मेरे हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे जब मेरी बड़ी दीदी की शादी हुई उसके बाद में पैदा हुई इसलिए मैं उनकी बेटी के सम्मानित थी मेरे जीजा जी मुझे अपने पिता समान लगते थे और मेरे मामा वह तो मुझे इस उम्र में बहुत खुश थी उन्हें ऐसा लगता था कि उनके बुढ़ापे की लाठी हूं मैं या मैं उनके जीवन में आकर खुशियां भर दिए भर्ती है आकर मैंने क्योंकि जब मैं पैदा हुई थी तो मेरे पापा 2 साल बाद ही रिटायर हो गए थे और मेरी मां उसे समय काफी कम उम्र की थी क्योंकि पापा और मम्मी में दोनों में आगे का बहुत ज्यादा डिफरेंट था या फिर पहले जमाने में ऐसा होता होगा कि कुछ भी उम्र लिखवा देते होंगे ज्यादा उम्र लिखवा के नौकरी लगवाई होगी जो भी हो फिलहाल तो मैं मां आपके जीवन में उसे समय आई थी जब उन्हें लगा ही नहीं था या उनके कोई और संतान नहीं होगी मुझे अपनी बड़ी जीजी और जीजा जी का अपने भाइयों का पिता सम्मान प्यार मिला इस तरह से मेरा बचपन बहुत लाल प्यार में बीता मुझे पता ही नहीं है कभी मैं बचपन में राई भी होगी या कभी मेरी आंख से एक आंसू भी निकला होगा या मुझे कभी किसी चीज के लिए डाटा भी गया होगा कभी किसी बात के लिए या कभी कोई एक थप्पड़ भी पड़ा होगा इतने अच्छे से रखा गया था उसके बावजूद मैं कभी बिगड़ी ही नहीं और ना मैंने कभी कोई गलत काम किया और ना मैंने कभी किसी चीज के लिए जिंदगी मैं तो पढ़ने में लगी रहती थी और सबके लब प्यार से जी रही थी अपने जीवन को और उन हैं दोनों जब मैं बचपन में छोटी ही थी करीब 6 साल की थी तभी से मुझे चढ़ गया था मैं उसे पढ़ना शुरू कर देती थी यहां तक की घर में कोई पेपर आता था सामान जिसमें रखे आता था या कोई लिफाफा तथा अखबार के पेपर का उसमें कोई स्टोरी होती थी या कोई रचना होती थी तो मैं उसे पढ़ने लगती थी और जब मैं छुट्टी हूं मैं अपने मां के घर जाती थी तो वहां हमारे हम उम्र भाई बहन से मेरे मामा का बेटा मेरी उम्र का तो हम दोनों मिलकर खूब सारी कॉमिक्स पढ़ते थे इतनी कॉमिक्स पढ़ते थे सुबह उठी उठी और कॉमिक्स पढ़ना शुरू रात को जब तक सोते नहीं थे तब तक कॉमिक्स पढ़ते थे पास में दुकान थी वहां से खरीद के लिए आते थे जब थोड़ा और बड़े हुए तो हमारे जीजा जी जो स्कूल में प्रिंसिपल थे तो वह अपने स्कूल से दुकान जो लाइब्रेरी होती थी वहां से घर के लिए किताबें और पत्रिकाएं ले आते थे जो भी आती थी वह पढ़ने के लिए अपने तो वह सब मैं पढ़ती थी वह साड़ी में पूरी चैट कर जाती थी उनको शायद पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता होगा और मैं सारी रचनाओं को सारी पत्रिकाओं को अखबारों को सब पढ़ लेती थी फिर मेरी मम्मी जो बहुत आध्यात्मिक विचारों की थी मंदिर जाती थी और मेरे पापा तो मुझे बहुत प्यार करते थे उनके प्यार को मैं अपने शब्दों में नहीं लिख सकती क्योंकि जब भी मैं उनका प्यार याद करती हूं मेरी आंखें भर आती है जब उनके पास पैसे शायद उसे समय नहीं होते होंगे जब आप मुझे महसूस हो रहा है इस बात का तब भी वह मुझे हर रोज पैसे देते थे कि तुम चीज कुछ खा कर आओ क्योंकि तुमको लगता होगा कि मेरी बेटी को कोई तकलीफ ना हो शायद इसलिए ही और मेरी मां जो मंदिर जाती थी तो वहां से भागवत गीता सूरसागर प्रेम सागर गीता महाभारत रामायण जितने भी सारे ग्रंथ होते थे भागवत कृष्ण पुराण जो भी पुराण वेद उत्सव ले लेकर आई थी घर में तो इतने बड़े-बड़े मोटे-मोटे ग्रंथ बहुत सारे में पढ़ लेती थी पता नहीं मेरे मेरे मन में पढ़ने का ऐसा कौन सा चश्मा था कि मैं पढ़ती ही रहती थी और पढ़ने के अलावा मेरे पास और कुछ काम भी नहीं था घर में पढ़ना स्कूल जाना और घर में जाकर खेलना और मैं बहुत शांत स्वभाव की किसी से झगड़ा नहीं करना किसी से भी ऊंची आवाज में बातें करना यह तो मैंने सीखा ही नहीं था और मैं झगड़ा करती भी किस हमारे घर में तो कोई छोटा भाई बहन ही नहीं था इसके साथ में झगड़ा करती है या लड़ाई करती इतनी मां-बाप का प्यार बहन का प्यार हमारे जीजा जी का प्यार भाइयों का प्यार उन सब ने मुझे बहुत मजबूत बना दिया था और मुझे ऐसा बना दिया था कि मुझे लगता था कि जीवन में प्रेम से ही सब कुछ संभव है जैसे ही मैं थोड़ा सा लिख सकती हूं इतनी बढ़िया करती थी जैसे मैं रामायण पढ़ती थी तो रामायण की कोई तो बंदी करने लगती थी या कोई और किताब करने लगी थी उनके ऊपर और बड़े भाई बहनों का भी कुत्ता क्यों नहीं पढ़ना लिखना है वह सब पढ़ाई वगैरह कर रहे थे मेरे मम्मी पापा के पास बहुत कम पैसे हैं और उन्होंने कम पैसों में भी मुझे सारी सुख सुविधा मिल रही थी तुम ही सोचती हूं आज की कैसे मिलती थी वह सारी सोच सुविधा मुझे कैसे वह दे पाते थे मुझे यह सारे सुख और आज जब हमारे पास इतना पैसा है तब भी हम इतने परेशान होते हैं दुखी होते हैं लेकिन जब मां-बाप के पास रिटायरमेंट के बाद इतना पैसा नहीं था मेरे पापा के पास तभी मुझे कोई तकलीफ नहीं होती थी जब कभी मैं स्कूल खाना लेकर नहीं जाती थी तो मेरे पापा मुझे आगे पूरा एक समोसे का बड़ा पैकेट देखकर जाते थे उसमें कम से कम 10 समोसे होते थे और हम अपनी सबसे पहले के साथ मिलकर खाते थे बैठकर स्कूल के दिन और वह बचपन के एक-एक दिन मुझे अभी भी याद है अब इतने प्यारे दिन थे कि मैं कभी जीवन में भूल ही नहीं सकती मेरा बचपन मुझे सबसे ज्यादा प्यार है अगर इसे अभी एक मौका दे तो मैं वापस उसे बचपन में लड़ जाना चाहती हूं क्योंकि मैं हर खेल को खेलती थी इतनी सारी पढ़ाई करती थी क्या किसी का ऐसा बचपन हो सकता है मुझे तो नहीं लगता कि इतना प्यार बचपन किसी और ने भी किया होगा मुझे और फिर हमारा बचपन जितना प्यार था उतना ही कष्टप्र था हमारा युवावस्था में कदम रखते हैं शुरू हो जाने वाला संघर्ष इतना संघर्ष इतना कष्ट इतना दुख इतना तकलीफ जो मैंने झोली क्योंकि कम उम्र में शादी हो गई तो वह अलग चीज है लेकिन बचपन की जहां तक बात है वह बहुत अच्छा मुझे पता और इस बचपन ने मुझे आज इस मुकाम तक बजाय कि मेरी नींद मजबूती हमारा बचपन हमारी नहीं भी तो होती है जो हमें एक बहुत ऊंची और बहुत मजबूत बिल्डिंग बनाने के लिए तैयार करती है अगर नींद मजबूत नहीं होगी तो ऊंची बिल्डिंग कहां टिकेगी तो हमारा बचपन तो प्रेम और लाड प्यार से भरा हुआ बचपन था जिसने हमारे अंदर इतनी मजबूत नहीं बना दी कि मुझे लेखन के उसमें काम तक बचाए और लगातार उसे मकान तक बढ़ाने की प्रेरणा देता है कि मैं बहुत दिन रात भी रचती रहूं तो कम पड़ जाए इतना इतना सारा जीवन में हमारे संघर्ष है इतनी सारी उतार-चढ़ाव रहे तो जो वह सब में लिखती रहो पूरा जीवन फिर भी काम नहीं होगा और मुझे बचपन की एक बात बहुत अच्छे से याद आती है कि मेरी मां मंदिर जाती थी सुबह तो वह मुझे उठती थी कि उठो बेटा उठो मैं मंदिर जा रही हूं तो मैं कहती थी हां ठीक है मैं उठ गई हूं और मैं चादर से अपना मुंह ढक लेती थी और सोचती रहती थी ना जाने कहां-कहां के सपने में जागती आंखों से ही देख लेती थी और वह सपना जो मैंने बचपन में जागती आंखों से देखे थे वह आज धीरे-धीरे सच हो रहे हैं ना जाने कैसे न जाने किस तरह कि वह बचपन मेरा बचपन इतना प्यार बचपन सबका तो नहीं होता है ना जो मैंने किया जिसे मैंने बोला वह मेरा बचपन सबसे अच्छा बचपन 

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