समझ नहीं आता

 समझ नहीं आता 

क्यों इतना दिल उदास हो जाता है

क्यों नही मन सम्भल  पाता है 

आँसू क्यों बहते रहते हैं

क्यों नही रोके रुकते हैं

लगता है में हार गयी हूँ

मै टूट गयी हूँ 

बिखर गयी हूँ

न जाने कैसे संभले गा

न जाने कैसे बहलेगा

कोई तो बताये मुझे

कोई तो समझा ये मुझे

कि बहुत भारी हो गया मन मेरा

देखो न बादल भी भारी हैं संग मेरे

और बरसते रहे रात भर संग मेरे

बारिश को मिला धरती का सहारा

सम्भल गया बादल

मैं रिस ती रही

मैं बहती रही

मचलती और सुबकती रही

यूँ ही तन्हा

यूँ अकेले

तुम्हारे लिए

तुम्हारे लिए।। 

सीमा असीम

25,1,23

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