जो भी सिर्फ तुम ही हो
तुम्हारे सिवा नजर नहीं आता कोई और
जो कुछ हो सिर्फ तुम हो मेरा रोम रोम पुकारता है तुम्हें सिर्फ तुम्हारा नाम जुबां पर रहता है हरदम एक ही नाम तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा मेरा हँसना, मेरा कं मेरा रोना मेरा मुस्कुराना सब कुछ तो तुम जानती हो सब समझते हो फिर क्यों क्यों किसलिए बस्सी क्यों की तलाश में मैं भटक रही हूं तड़प रही हूं मचल रही कब से ना जाने कब से और ना जाने कब तक जब मिलेगा मुझे इस सवाल का जवाब तब शायद मन को सुकून आएगा चैन आएगा घबराहट दूर चली जाएगी खत्म हो जाएगी क्योंकि तलाश पूरी हो जाएगी
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