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Showing posts from April, 2022

काफल

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 चलो आओ जिंदगी को जीने चलते हैं लो तुम मेरा हाथ पकड़ो हम बहुत दूर तक चलते हैं तुम मेरा सहारा ले लेना  जब जरूरत पड़े तुम्हें ऊंचे नीचे रास्ते पर  वो देखो काफल पकने लगा है पहाड़ों पर  हरा हरा पेड़ लाल लाल फलों से भरने लगा है  तुम पके हुए काफल मुझे तोड़ कर दो न मैं स्वाद लेकर बताउंगी कि कैसा है अगर मीठा निकला तो तुम्हें खिला दूंगी अगर खट्टा हुआ तो खुद खा लूँगी  फिर लाल लाल काफल खूब सारे तोड़ कर अपनी झोली में भरकर ले आऊंगी कोई बात नहीं अगर पड़ गया कपड़ों पर धब्बा लाल सुर्ख लाल तो भी क्या हुआ लाल रंग तो प्रेम का प्रतीक है हैं न? यह लाल काफल हमें जीने  की सच्ची राह दिखा देंगे तो आओ चलो न  जिंदगी को जीने और काफल को खाने... सीमा असीम
सोचती हूँ कि दोगला क्या शब्द होता है  फिर मुझे लगता है दोगला वह होता है  जो कभी अपनी बात पर कायम नहीं रहता  कभी वह वफा नहीं कर सकता उसका धर्म होता है सिर्फ बेवफाई  अपने फायदे के लिए हर गलत काम करने वाला जो एक दिन खुद अपनी नजरों में ही गिर जाता है जब तक मतलब रहा साथ चलना फिर स्वार्थ के लिए किसी को मार देना उसका सबकुछ लूट कर बर्बाद कर देना बस यहीं काम होता है एक दोगले इंसान का सीमा असीम 

प्रेम

 जहां प्रेम होता है वहां किसी और चीज की कोई जगह ही नहीं होती  सिर्फ प्रेम होता है  क्योंकि प्रेम से बढ़कर कुछ और है ही नहीं  और प्रेम में सिर्फ प्रेम के कुछ और है ही नहीं   प्रेम होता है अगर तो सिर्फ प्रेम होता है  और प्रेम कभी बदलता नहीं है  प्रेम बस आता है जाता नहीं   जो है जैसा है वह वैसा ही हमेशा रहता है  तभी तो प्रेम है तो मैं हूँ और तू भी और तू और मैं मिलकर बन गए हम  हां हम एक हैं क्या दूर क्या पास हमेशा एक और रहेंगे सदा सीमा असीम 

आँसू हैं या लहू

 जब आँख से आँसू बहने शुरू होते हैं  तब बहते ही रहते हैं  रुकते ही नहीं हैं  मानों आँखों से कोई समुंदर फूट पड़ा हो  जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा  ऐसा लगता है  जिस्म का सारा लहू आँखों से बह बह कर बाहर आ रहा है  और बेजान सा जिस्म एक तरफ को पड़ा रहता है  मैं सोचती हूँ कि तुम ऐसे हो अगर तो ऐसे क्यों हो  क्या तुम हम जैसे इंसान नहीं हो  क्या तुम्हारे अंदर कोई भावना नहीं है  कोई दर्द नहीं है  कोई तकलीफ का अहसास नहीं है  तुम कैसे कर लेते हो सब कुछ इतनी आसानी से  कोई मर रहा है अगर  तो तुम उसे यूं ही मरने के लिए छोड़ देते हो  इतने कठोर शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर लेते हो  प्रेम के नाम पर नफरत फैलाने वाले काम कैसे कर लेते हो  क्या तुम्हारा कोई माँ बहन नहीं है  क्या तुम औरत को सिर्फ इस्तेमाल किए जाने वाली वस्तु मात्र समझते हो  सुनो हे निर्दयी मानव  तू कैसे तड़पा लेता है  तू कैसे रुला लेता है  क्या तू दानव है या राक्षस  तुझे जरा भी दया धर्म नहीं है  नोच खसोट के तन मन से बर्बाद...

दगाबाज

 जो दगाबाज होता है  कई रूप रखता है  असली चेहरा कभी नजर नहीं आता कई चेहरों के पीछे कहीं थोड़ा बहुत होता है वो खुद ही खुद को नहीं समझ पाता है इस कदर दगाबाज होता है खूब करता है वो चालाकियाँ खूब लूटता है वो कमजोर को और वो मजबूत से डरता भी है उसके आगे झुक भी जाता है पर याद रखना ओ दगाबाज एक कमजोर की आह सात आसमान चीर जाती है उसकी आह कभी खाली नहीं जाती है वो दर्द से तङप जाता है दग़ाबाजी की चाल से रो पड़ता है आँसू नहीं सूखते कभी उसके रात दिन रोता है तड़पता है आहें भरता है दुखी होकर बद्दुआ देता है सुन खोखले इंसान तू एक कमजोर की गाली ईश्वर को भी हिला देती है जब वो दुखी होकर पुकारता है कभी पुकार खाली नहीं जाती तू सुन दगाबाज तेरा अंजाम भी बहुत बुरा होगा तू इतना रोयेगा तड़पेगा पैरों में गिरकर गिड़गिड़ायेगा फिर भी तू सकूं नहीं पायेगा तुझे तेरी करनी का फल मिलेगा जरूर मिलेगा याद रख देर जरूर है पर अंधेर नहीं है जैसा किया है वही मिलेगा तुझे ओ दगाबाज असीम