मिलन में मन लगा हुआ था तो जरा सी टिक की आवाज से उसके वापस आने का भ्र्म हो रहा था, व्हाट्सप्प पर कोई मेसेज की आवाज सुनकर उसने झट से मैसेज बॉक्स खोला, परी मिलन का मैसेज नहीं उसके भाई का मैसेज था उसने भाई का मैसेज पढ़ आपकी समय निकलोगे वहां से बस भाई अभी थोड़ी देर में निकलने वाले रिप्लाई भी कर दिया, ठीक है समय पर पहुंच जाना अरे यार जिसके मैसेज का इंतजार था उसका तो आया नहीं भाई का आ गया, चलो कोई नहीं मत आने दो पार्किंग कर लेती हूं निकलना भी तो है, स्पार्क्स की घंटी बजी तो देखा मिलन का इमेज बहुत प्यारी कविता लिखी हुई थी जान मेरे संग संग चल आया था मैं अकेला नहीं आया, प्रेम प्रेम कभी एक तरफ होता ही नहीं है दोनों तरफ से ही होता है लेकिन प्रेम मिलकर भी बिछड़ जाता है और बिछड़ कर भी मिल जाता है,
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Showing posts from February, 2022
तुम और मैं
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जब मैं तेरे साथ रहती तब मैं अकेली सी रहती थी अब मैं दूर हूं तुझसे तू भी क्यों हरदम इतने करीब रहती हूं कि तुम रहते हो हमेशा मेरे साथ मेरी परछाई बनकर मेरे आस-पास कभी पल भर भी तो तुम दूर नहीं जाते हो मुझसे एक पल को भी तो अकेला नहीं छोड़ते हो तुम मुझे चलते रहते हो संग संग बैठे रहते हो संग संग बातें करते रहते हो संग संग सो जाते हो तुम संग संग ख्वाबों में भी तो कहां दूर जाते हो तुम कभी जगा देते हो अचानक से तो भी तो पल भर को दूर नहीं जाते मेरे एहसास हरदम तुम्हारे साथ रहते हैं यूं कहो कि तुम एहसास बनकर सदा मेरे साथ रहते हो कभी कहीं एक क्षण को भी तो अलग नहीं होते हो क्यों आखिर क्यों क्यों रहते हो तुम मेरे साथ फिर खुद में कौन रहता होगा तुम्हारे तुम अब तुम नहीं रहे हो तुम मैं बन गए हो क्या तुम्हें पता नहीं जैसे मैं तुम बन गई हूं और तुम मैं बन गए हो असीम
ख्वाब एक है
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क्या तुम जानते हो क्या तुम्हें पता है जीने के लिए अनेकों ख्वाबों की जरूरत नहीं होती सिर्फ एक ख्वाब ही काफ़ी है जैसे काफी एक ही ख्वाहिश तुमसे मिलने की तुमसे बातें करने की और तुम्हें देखने की हां मेरी एक ही ख्वाहिश है और एक ही ख्वाब वह है तुम हां तुम ही हो मेरी ख्वाहिश तुम ही हो मेरा ख्वाब सिर्फ तुम और कोई भी नहीं कभी भी नहीं तुम्हारे सिवा हाँ तुम... सीमा असीम
ख़्वाहिश
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ख्वाहिश है मेरी समुंदर का किनारा हो और बरफ की घाटियां भी हो कभी समंदर के किनारे चलते-चलते बहुत दूर निकल जाए पर समुन्दर का छोर न ढूंढ पाये कभी घाटियों की छोटी मोटी टेढ़ी-मेढ़ी आड़ी तिरछी पगडंडियों पर चलते हुए हिमालय की चोटी पर पहुंच जाएं कभी कोई गीत गुनगुनाए सु मधुर धुन में कभी सिर्फ बातों में ही खोए रहें और चलते चले जाए चलते चले जाए इस धरती से उस अंबर तक हम तुम तुम हम अनंत तक साथ साथ हमेशा साथ साथ सीमा असीम