सजा
तुम्हारी बातों से मन सुखी हो जाता है
तुम्हारी बातों से मन दुखी हो जाता है
जब मन है मेरा तो मेरी बातों से सुखी होना चाहिए
मेरी बातों से दुखी होना चाहिए
तुम्हारी बातों से क्यों हो
तुम अगर मेरे होते तो तुम मुझे दुख नहीं देते
कभी दुख देने की कोशिश नहीं करते
मुझे बार बार धोखा नहीं देते
हो सकता तो सुख देते
लेकिन तुम हमेशा मुझे एक नया दुख
खोज कर देते हो और
मैं उस दुख में डूबी रहती हूं
गम में गहरे उतर जाती है
कोशिश करती हूं निकलने की
बहुत भयंकर कोशिश करती हूं तो
कभी उस दुःख से बाहर निकल आती हूं
तो कभी उस दुःख से निजात पा जाती हूं
लेकिन सुनो मैं कभी मुस्कुरा नहीं पाती
भूल गयी हूँ मैं जैसे मुस्कुराना
और इसका कारण हो तुम
तुम मेरे दोषी हो
तुम्हें क्या सजा दूँ मैं
यही सजा कि तुम भी इन दुखों में
मेरे सहभागी बने रहो....
सीमा असीम
26,2,21
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