मेरी पलकों पर ख्वाब हैं या है भार तेरे होने का रहने दो इन ख्वाबों को सदा मेरी झुकी पलकों पर हाँ प्रिय सुनो यह जो मेरी झुकी झुकी सी पलकें हैं न , इन पर तुम्हारे होने का सबूत है जिस कारण मेरी मैं बड़े प्यार से सहेजे रहती हूँ अपनी पलकों पर बैठे तुमको ,, क्या तुम्हें पता है कि सच यही है सिर्फ यही एक सच है इस मेरी दुनिया का ,, कोई दूसरा न कोई सच है न कोई झूठ है और इसीलिए मुझे पसंद है सच को हमेशा सच बनाए रखना ,, मैं जानती हूँ कि मुझे अपने हिस्से के सच को संभाले रखना है बाकी तुम अपना खुद ही सोचो कि सच कितना और झूठ कितना , क्योंकि मैं चाहती हूँ तुम्हें कभी मेरे सामने अपना सिर झुकाकर कर खड़ा होना पड़े या शर्मिंदा होने पड़े ,, तुम्हारा सम्मान मेरा सम्मान है तभी तो तुम्हें गलत कहता है मुझे वही शख्स गलत लाग्ने लगता है और मैं उससे तुम्हारे लिए लड़ पड़ती हूँ और उससे इतना दूर हो जाती हूँ कि फिर कभी वो मुझे तुम्हारे बारे में कुछ कह न सके ! तुम भी तो ऐसा ही करते होगे न , हाँ जरूर करते होगे , बस एक बात हमेशा ध्यान में रखना कि तुम्हारे बारे में कभी कोई बात किसी दूसरे मुंह या अ...
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Showing posts from November, 2019
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यूँ ही तो नहीं होता अहसास कि मैं जी जाती हूँ या कभी मर सी जाती हूँ यूं ही तो नहीं फूट पड़ती हैं कोपलें कि बीज बोया तो होगा जरूर ये शब्द कैसे रचते रहते हैं तुम्हें कैसे बन जाती है कोई प्यारी सी प्रेम कविता कैसे गा उठता है मन कैसे मधुर राग बजने लगता है यूँ ही तो नहीं रात भर झरती है ओस और सुबह सुबह चमक उठती हरियाली पर घास पर पत्तों पर नाच उठता है मन का मयूर जैसे नाचने लगता है मोर आकाश में घिरी घटाएं देखकर सुनो प्रिय मैं रचती रहती हूँ तुम्हें दिन रात अपने प्रेम पगे मन से कभी तुम भी लिखो न अपने सच्चे अल्फ़ाजों में मुझे अपने दिल की कलम से ,,, सीमा असीम
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है अब तो कुछ सुखन का मेरे कारोबार बंद रहती है तब अ सोच में लैलो-निहारबंद दरिया सुखन की फिक्र का है मौजदार बंद हो किस तरह न मुंह में जुबां बार-बार बंद जब आगरे की ख़ल्क का हो रोज़गार बंद जितने हैं आज आगरे में कारखाना जात सब पर पड़ी हैं आन के रोज़ी की मुश्किलात किस-किस के दुख को रोइये और किसकी कहिये बात रोज़ी के अब दरख़्त का मिलता नहीं है पात ऐसी हवा कुछ आके हुई एक बार बंद
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जीत एक नौजवान योद्धा , जिसने कभी कोई युद्ध नहीं हारा था ने सोचा की अगर मैं मास्टर को लड़ने के लिए उकसा कर उन्हें लड़ाई में हरा दूँ तो मेरी ख्याति और भी फ़ैल जायेगी और इसी विचार के साथ वो एक दिन आश्रम पहुंचा . कहाँ है वो मास्टर , हिम्मत है तो सामने आये और मेरा सामना करे . ”; योद्धा की क्रोध भरी आवाज़ पूरे आश्रम में गूंजने लगी . देखते -देखते सभी शिष्य वहां इकठ्ठा हो गए और अंत में मास्टर भी वहीँ पहुँच गए . उन्हें देखते ही योद्धा उन्हें अपमानित करने लगा , उसने जितना हो सके उतनी गालियाँ और अपशब्द मास्टर को कहे . पर मास्टर फिर भी चुप रहे और शांती से वहां खड़े रहे . बहुत देर तक अपमानित करने के बाद भी जब मास्टर कुछ नहीं बोले तो योद्धा कुछ घबराने लगा , उसने सोचा ही नहीं था की इतना सब कुछ सुनने के बाद भी मास्टर उसे कुछ नहीं कहेंगे … उसने अपशब्द कहना जारी रखा , और मास्टर के पूर्वजों तक को भला-बुरा कहने लगा … पर मास्टर तो मानो बहरे हो चुके थे , वो उसी शांती के साथ वहां खड़े रहे और अंततः योद्धा थक कर खुद ही वहां से चला गया उसके जाने के बाद वहां खड़े शिष्य मास्टर ...
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बड़ा सोचो अच्छा सोचो अत्यंत गरीब परिवार का एक बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था | घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी , इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियां ही रखी थी | आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी , और वह टिफिन में से रोटियां निकाल कर खाने लगा | उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था ! , वह रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अन्दर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो , जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियां थीं!! उसकी इस हरकत को आस पास के और दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे | वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता | सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था | आखिरकार एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया की भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो , तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमे सब्जी हो | तब उस युवक ने जवाब दिया , “ भै...
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कोई न रोके दिल की उड़ान को दिल वो चला आ आ आ सुनो प्रिय सच तो यही है न कि मैं तुम्हें कभी याद ही नहीं करती लेकिन तुम हमेशा मेरी यादों में रहते हो मेरे मन में बस्ते हो और आँखों में समाये रहते हो ,,,अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ कैसे याद करूँ और कैसे भुलाऊँ ? सनम यह प्रेम है कोई खेत की मुली नहीं है कि जब मन किया तोड़ा और खा लिया या फिर काट कर फेंक दिया इसको तो आग भी नहीं जला सकती बल्कि आग मेन तपकर और भी निखार ले आती है प्रेम को जीवन दे देती है फिर तुम कैसे समझ लेते हो कि जब मन में आया तो प्रेम कर लिया और जब मन में आया तो उसकी परवाह करना छोड़ दिया , याद भी नहीं किया कभी नाम भी नहीं लिया बस मुंह देखा प्यार किया नाम लेना भी छोड़ दिया हैं न प्रिय ? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारा नाम मेरे होंठों पर मिश्री सा घुलता रहता है हर पल आती जाती सांस के साथ जुबां पर रहता है ,, प्रिय तुमसे कैसे कहूँ कि जब कभी आईना देखती हूँ तो मुझे मैं कहीं नजर नहीं आती सिर्फ तुम ही तुम , हर तरफ और हर जगह तुम्हारा होना महसूस होता है तो भला बताओ मैं कैसे खुद को महसूस करूँ , कैसे खुद को कहीं पाऊँ , कैसे मैं कहीं भी स्...