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तुमसे

 तुझसे कुछ कहने से अच्छा है मैं खुद से ही कह लिया करूं  समझा लिया करूँ खुद को ही खुद से कि फायदा ही क्या है  तुमसे कुछ कहने का सुनने का  मैंने तो सुना था कि कुछ कहे  बिना ही  हम एक दूसरे से कह सकते हैं अपने मन की बातें  सुन सकती है एक दूसरे के मन की बातें  क्यों नहीं सुनाई देती मेरी बातें  या फिर तुम सुनकर भी अनसुना करते हो मुझे  मेरी आत्मा पुकारती है जब तुम्हें ना  समझो पूरी पृथ्वी की डोल जाती होगी  आकाश भी गरज के बरसने लगता होगा बादल बंन कर  और भिगो देता होगा पूरे ब्रह्मांड को अपने पानी से जैसे मैं भिगोती हूँ खुद को आंसुओं में तरबतर करके.... सीमा असीम 

कारोबार

  कहाँ होती होंगी उसे तकलीफ या दर्द होता होगा जिनका धंधा है यही जिनका कारोबार है यही.. उसे क्या फर्क पड़ता होगा मेरी जाँ निकलने से उसने तो सब सोचसमझ कर किया होगा बहुत चतुर दिमाग़ है उस एहसान फरामोश के पास  दिल का उसके जिस्म में कहीं नामोनिशान नहीं होगा  स्वार्थ से भरा हुआ सिर्फ फायदा ही देखता रहा अपना  मतलब निकलते ही  पहचानना भूल गया होगा मत रो अब सीमाउसको याद करके रातदिन

नयी कविता

 अब तुम ही बताओ मुझे कि कैसे दूर जाएँ हम तुमसे  जहाँ भी जाती हूँ तुम वहीँ पर आ जाते हो  जिस किसी को देखूं तुम ही दिख जाते हो  और तो कोई नजर आता नहीं है  सिवाय तुम्हारे सिर्फ तुम ही तुम  तुम फूलों में पत्तों में पौधों में  हर जगह पर बस तुम्हारा ही अक्स  जागती आँखों में भी और सोने के बाद ख़्वाबों में भी  क्यों नहीं जाते तुम पल भर को भी मुझसे दूर  क्या तुम्हें मैं इस कदर याद आती हूँ कि  हर वक्त मन मस्तिष्क में चिपके रहते हो  या यूँ कहें कि बादलों की तरह मुझ पर छाये रहते हो  आकाश की तरह झुके रहते हो  बारिश हो जाए गर कभी  तो हर बूंद में तुम ही तो होते हो और खिंच लेते हो यूँ चुम्बक की तरह  मुझे बारिश में भीगने के लिए और  कर देते हो मुझे तरबतर अपने ही अक्स से  तब सुनो मैं मैं नहीं रहती मैं तुम बन जाती हूँ  सिर्फ तुम ही तुम  मैं कहीं भी नहीं ......... सीमा असीम सक्सेना  १६,६,२२ 

कविता

अब तुम ही बताओ मुझे कि कैसे दूर जाएँ हम तुमसे  जहाँ भी जाती हूँ तुम वहीँ पर आ जाते हो  जिस किसी को देखूं तुम ही दिख जाते हो  और तो कोई नजर आता नहीं है  सिवाय तुम्हारे सिर्फ तुम ही तुम  तुम फूलों में पत्तों में पौधों में  हर जगह पर बस तुम्हारा ही अक्स  जागती आँखों में भी और सोने के बाद ख़्वाबों में भी  क्यों नहीं जाते तुम पल भर को भी मुझसे दूर  क्या तुम्हें मैं इस कदर याद आती हूँ कि  हर वक्त मन मस्तिष्क में चिपके रहते हो  या यूँ कहें कि बादलों की तरह मुझ पर छाये रहते हो  आकाश की तरह झुके रहते हो  बारिश हो जाए गर कभी  तो हर बूंद में तुम ही तो होते हो और खिंच लेते हो यूँ चुम्बक की तरह  मुझे बारिश में भीगने के लिए और  कर देते हो मुझे तरबतर अपने ही अक्स से  तब सुनो मैं मैं नहीं रहती मैं तुम बन जाती हूँ  सिर्फ तुम ही तुम  मैं कहीं भी नहीं ......... सीमा असीम सक्सेना  १६,६,२२ 

कविता

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 निर्मल झील में खड़े होकर  पल भर को आंखें बंद करके  इसकी गहराई की तरह  खुद में गहरे उतरते हुए  सोचा मैंने  जरूरी है सोचना भी कि   कितने विस्मयों से भरी हुई है यह पृथ्वी  कितनी खूबसूरती समाई हुई है इसमें..  सूरज चांद को तकते हुए या फूलों को निहारते हुए  अक्सर यही तो सोचती हूँ मैं कि खूबसूरती सारी हमारे मन में होती है  निर्मलता पवित्रता सारी हमारे मन से होती है  सारे अचंभे सारे विस्मय हमारे मन में होते हैं  अगर हम सच में महसूस कर सके तो  या फिर एहसासों में भर सके तो..... सीमा असीम

कबीर

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
 जब तुम कहते हो  बेहिचक मेरी कमियों को तो मेरी हिचक कुछ और कम होती है जैसे डूबता हुआ तारा  चमकने लगता है कुछ और ज्यादा ठीक वैसे ही मेरे बुझते चेहरे पर  मुस्कान कुछ और तेज होती है असीम