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सजा

 तुम्हारी बातों से मन सुखी हो जाता है तुम्हारी बातों से मन दुखी हो जाता है  जब मन है मेरा तो मेरी बातों से सुखी होना चाहिए मेरी बातों से दुखी होना चाहिए तुम्हारी बातों से क्यों हो तुम अगर मेरे होते तो तुम मुझे दुख नहीं देते कभी दुख देने की कोशिश नहीं करते मुझे बार बार धोखा नहीं देते  हो सकता तो सुख देते लेकिन तुम हमेशा मुझे एक नया दुख खोज कर देते हो और मैं उस दुख में डूबी रहती हूं  गम में गहरे उतर जाती है कोशिश करती हूं निकलने की बहुत भयंकर कोशिश करती हूं तो कभी उस दुःख से बाहर निकल आती हूं तो कभी उस दुःख से निजात पा जाती हूं लेकिन सुनो मैं कभी मुस्कुरा नहीं पाती भूल गयी हूँ मैं जैसे मुस्कुराना और इसका कारण हो तुम तुम मेरे दोषी हो तुम्हें क्या सजा दूँ मैं यही सजा कि तुम भी इन दुखों में मेरे सहभागी बने रहो.... सीमा असीम 26,2,21
 चांद को देखना एक तक देखते जाना  घटते बढ़ते और 16 कलाओं से परिपूर्ण होते जाना   कितना सरल है ना  चांद को देखना  चांद की पवित्र चांदी में नहाई  धरती पर अपनी परछाई को  पकड़ने की कोशिश करना छोटी बड़ी आड़ी तिरछी लंबी नाटी  परछाई को पकड़ कर अपने गले से  लगाने की कोशिश करना सरल है ना परछाई को नापना  इतना ही सरल तो है बस तुम्हें पढ़ना और सिलसिलेवार लिखते चले जाना चाँद का आसमां में मुस्कुराना सीमा असीम 23,2,21

फुहार

 क्या तुम्हें बारिश ही पसंद है अगर हाँ तो कौन सी?  तूफान वाली मूसलाधार या फिर  हौले हौले रिमझिम फुहारों वाली रिमझिम फुहारों वाली ना  जब हम झूलते हैं बैठ के झूले पर सावन गाते हैं और फुहारों में भीगते जाते हैं  तो बरसों ने रिमझिम बहारों की तरह  हौले हौले  मध्यम मध्यम ताकि मैं झूल सकू झूला   रिमझिम रिमझिम पडती बारिश की फुहारों के बीच... सीमा असीम 22,2,21

कमाल

 कभी कमाल सा लगता है और कभी लगता है अजूबा  एक बार ख्याल में लाओ या  जिसको एक बार सोच में लाओ  उस तक हमारी आवाज कैसे पहुंच जाती है  वह कैसे समझ जाता है हमारे मन की सारी बातों को  जो हम उसे कहना चाहते हैं वह भी और जो छुपाना चाहते हैं वह भी होता है ना ऐसा हां बिल्कुल होता है यही तो है कमाल यही तो अजूबा मन से मन की बात कहने का सीमा असीम 18,2,21
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भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विन्ध्याचल सदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्। हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराण में विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी। श्रीमद्देवीभागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ। विश्व की एक मात्र ख...