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Showing posts from March, 2025

असीम दुःख दर्द

 मुझे बस इतना पता है कि तुम किसी बात की परवाह नहीं करते हो, ना किसी से डरते हो, खुद गलत होते हुए भी खुद को हमेशा सही कहते हो, ना जाने क्यों किस लिए और आखिर किस वजह से, जो शहनशाही अपने लिए मन में पाल रखी है कि जो तुम हो वही सही है या जो कुछ भी तुम करते हो बस वही सही है या फिर जो कुछ भी तुमने किया बस वही सही है लेकिन तुम्हें एक बात बताऊं ऐसा नहीं होता है, खुद से भी बढ़कर एक शक्ति है जो सब कुछ देखती है, सब कुछ जानती है और सब कुछ समझती है, वह अभी सजा नहीं आपको दे रही है लेकिन समय आने पर उस सजा को तुम्हें भुगतना पड़ेगा, उस अंजाम को तुम्हें हर हाल में सहना पड़ेगा, जीना पड़ेगा तड़प तड़प कर, तुम्हें इस तरह से जैसे वह तुम्हें जीने की परमिशन देगा, इजाजत देगा सिर्फ वही तुम्हें करना होगा, तब तुम्हारी इच्छा से कुछ नहीं होगा या तुम्हारी मानने से, समझने से भी कुछ नहीं होगा, होगा वही जो कि वह सत्ता चाहती है, जो अलौकिक है अद्भुत है अचंभित कर देने वाली है और मेरा यकीन है कि वह सत्ता है और वह आज नहीं तो वक्त आने पर तुम्हें उसे अंजाम तक जरूर पहुंचाएगी जिस अंजाम के तुम हकदार हो या तुमने जो कुछ भी किया है...

प्रेम

 प्रेम के लिए लोगों ने  न जाने किया महल बनाये  दुमहल बनाये और दुनिया में अजूबे भी बनाकर खड़े कर दिए  लेकिन तुमने क्या किया  डुबा दिया मुझे इस कदर कि  उबरने का नाम ही नहीं है  बताओ कोई प्रेम को सर का ताज बना लेता है  और तुम जैसा कोई  प्रेम को गर्त में डुबा देता है  शायद तुम स्वार्थ के वश में  न जाने क्या क्या करते रहे  खुद को ही खुदा समझते रहे  कभी सोचा ही नहीं मेरे बारे में  दिया ही नहीं वो सम्मान  जिसकी मैं हकदार थी  अब क्या ही कहूँ और कितना कहूँ  कोई फर्क तो पड़ेगा नहीं न  तुम क्या जानोगे प्रेम की  ऊंचाइयों क्या होती हैं  कैसे प्रेम को निभा लिया जाता है  हर गलती को माफ़ कर गले से लगा लिया जाता है  काश कि आये तुम्हें सद्बुद्धि  थोड़ी ही सही  आये और मुझे समझ पाओ  साथ ही प्रेम को भी.... सीमा असीम  2,3,25

प्रेम और घृणा

 घृणा और प्रेम का एक ऐसा नाता है  जिसे एक दूसरे से कभी अलग किया ही नहीं जा सकता  जहां प्रेम है वहाँ घृणा है और  जहाँ घृणा है वहां प्रेम है  प्रेम के अंदर घृणा घुसी हुई है और घृणा के अंदर प्रेम हम जिसे प्रेम करते हैं  उसी से हम घृणा भी करते हैं और  जिसे घृणा करते हैं  उसी से हम प्रेम करते हैं  अधाह प्रेम करते हैं और  अधाह घृणा भी  न जाने क्यों ऐसा है? लेकिन यही सच है  तभी तो मैं तुम्हें जितना प्रेम करती हूं  उतनी ही तुमसे घृणा करती हूं और  जितनी मैं तुमसे घृणा करती हूं  उससे कई कई गुना ज्यादा मैं  तुमसे प्रेम करती हूं  यही सच है और  यह सच कभी खत्म नहीं हो सकता  हमेशा रहेगा  प्रेम और घृणा का संबंध यूं ही... सीमा असीम  1,3,25