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Showing posts from December, 2022

बरेली

  झुमका सिटी, बांस बरेली, नाथ नगरी, आला हजरत की नगरी के नाम से मशहूर बरेली शहर एक महानगर है, यह भारत की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीचो-बीच है,,, दिल्ली से 250 किलोमीटर के लगभग और लखनऊ से भी 250 किलोमीटर दूर है तो दोनों की दूरी बराबर है और बरेली दोनों के  बीच में ही पड़ता है,, बहुत ही प्यारा शहर बरेली उत्तर प्रदेश का आठवां सबसे बड़ा शहर है,,,   बडे कवि लेखक उधर है जैसे कि निरंकार देव सेवक जी,, जो बाल कवि थे,  चंदा मामा दूर के जैसी कविता लिखी,  जो हर बच्चे बच्चे की जवान पर रहती है,  चंदा मामा दूर के पुए पकाए बूरके जैसी कविताएं लिखी और उन्होंने पूरे भारत का नाम रोशन किया वह विदेशों तक में वह फेमस है प्रसिद्ध है उनको लोग जानते हैं जैसे प्रियंका चौपड़ा, दिशा पटनी आदि ,,   बरेली शहर भारत का एक ऐसा शहर है जो एक गाने की वजह से  लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है, बहुत पुराना गाना झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में इसकी वजह से आज तक लोग बोलते हैँ कि कहां गिरा था कहां गिरा था,,,  मुझसे अक्सर लोग पूछते  हैँ अगर मैं कभी कही...

Khush rhna

मेरी आंख में आंसू है तो क्या हुआ तुम सदा खुश रहना  दर्द ही दर्द हैं दिल में तो क्या हुआ तुम सदा खुश रहना  सच्चे मन से मांगती हुई दुआ रात दिन तुम्हारी ख़ुशी के लिए  छुए ना कोई आज के बाद तुम्हें कोई गम तुम सदा खुश रहना..  सीमा असीम

तेरे लिए

  खुश रहे तू आबाद रहे जहां भी रहे बस याद तुझको इतना रहे कि कोई जीता है सिर्फ तेरे लिए। होगी कबूल मेरी दुआ यकीन है मुझे तू रहेगा मेरा सदा जहां भी तू रहे  कि जीती हूं मैं सिर्फ तेरे लिए तेरे लिए सिर्फ तेरे लिए।।। असीम 

निर्मल

  कितना निर्मल जल होता है दरिया का उसमे कहीं कोई मिलावट नहीं कोई कुछ नहीं साफ एकदम... न जाने कहां से पथरीले पत्थर जैसे घृणा द्वेष नफरत आ जाते हैँ और फिर हमें जख्मी करते रहते हैं... हां यही तो होता है अक्सर जब हम प्रेम में होते हैं तो एकदम निर्मल दरिया की तरह एक दूसरे के साथ प्रेम की बाहों में मगन होकर बहते रहते हैँ...  फिर धीरे-धीरे करके नफरत घृणा और द्वेष के पत्थर आने लगते हैं प्रेम के दरिया में और फिर हमारे मन को आत्मा तक को जख्मी कर देते हैं.... इन पत्थरों से जो जख्म हो जाते हैं वह नासूर की तरह रिसते रहते हैं, इतना दर्द होता है, इतना दर्द होता है कि आंसू रोके ही नहीं रुकते किसी भी तरह से, किसी भी हाल में हम   अपने आंसुओं को रोक ही नहीं पाते हैँ यह बहते रहते हैं दर्द से बोझिल होकर,,,   निर्मल पवित्र बेबस से बेचारे आँसू....  असीम 

निष्ठुर

 कैसे हो जाते हो तुम इतने निष्ठुर   कैसे इतने कठोर हो जाते हो  क्यों आ जाता है तुममें अहम   क्यों तुम  इतने बेदर्द हो जाते हो  हां अक्सर यही सवाल तो मेरे दिल में होता है मैं सोचती रह जाती हूं कि तुम इतने मुलायम कोमल निर्मल नदी के सामान बहते हुए थे जो हर समय मेरे आस-पास रहते थे....  मंडराते रहते थे किसी बादल की तरह और बरस जाते थे अभी आसमा की झुक जाते थे.. फूलों सी मुस्कान बिखेर देते थे मेरे आस पास... खिला खिला  रहता था मेरा मन मेहकता हुआ जादुई एहसास से भरा रहता था  कभी कोई मन में  नफरत घृणा द्वेष ऐसी कोई बात नहीं..  जानती ही नहीं थी यह भी कोई शब्द होता है फिर कैसे क्या हो गया इतना नरम कोमल मुलायम दरिया जैसा  तुम्हारा दिल एकदम कठोर पर्वत की तरह हो गया   क्या तुम्हें लगता भी नहीं कभी क्या तुम कभी सोचते  भी नहीं  मैं बहुत दुखी हूं   ऐसा क्यों आखिर क्यों?