तुम्हारी हंसी

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न जाने कितना छुपा होता है दर्द 

हमारी हंसी में 

हमारी मुस्कान में 

जहां मर्म है 

संवेदना है 

वहां हंसी भी है। 


हम हंसते हैं 

मुस्कुराते हैं 

तो चमकने लगता है हमारा चेहरा 

जैसे धुला-धुला सा 

बिल्कुल साफ 

और पवित्र।


ऐसी ही है 

तुम्हारी हंसी भी 

तुम जब हंसती हो 

खिल जाता है जैसे 

तुम्हारा पोर-पोर 

तुम्हारे चेहरे की खाल को 

पतला कर देती है 

तुम्हारी हंसी 

तुम्हारी मुस्कुराहट। 


जब हंसती हो तुम 

परिंदे जैसे उड़ने लगते हैं 

आसमान में खुशी से। 


तुम्हारी धिमि हंसी 

तुम्हारी धिमि मुस्कुराहट 

लगती है बिलकुल नरम, मुलायम 

जैसे डूबी हो 

ओस की नमी में।


आंखें गीली-सी हो जाती हैं खुशी से 

जब तुम हंसती हो खिलखिलाकर 

बिल्कुल पागलों-सी 

तब हंसी जैसे थिरकती रहती 

पल भर वहीं पर 

तुम्हारे आसपास। 


कभी तुम्हारी हंसी 

तुम्हारी मुस्कुराहट 

स्वतः स्फूर्त होती 

जैसे निःसृत हो रही हो 

तुम्हारे भीतर से 

अंतर्तम से, 

अंतर्मन से

तब मानो पूरा वजूद ही मुस्कुरा उठता 

एक तरह की लुनाई उभर आती है

तुम्हारे चेहरे पर।


जब तुम कुछ पूछती हो किसी से 

अपनी रसपूर्ण मुस्कुराहट के साथ 

तो जैसे पिघल ही जाता है 

सामने वाला 

धीमे से कंपन होने लगता है 

होठों की पंखुड़ियों में 

तुम्हारी सल्लज मुस्कुराहट से।


बहा ले जाती हो 

आसपास के परिदृश्य को 

हंसती हो जब तुम 

मोहक अंदाज में 

महक जाता है जैसे समूचा वातावरण 

तुम्हारी सदाबहार हंसी से 

नहीं टिकती पल भर भी 

उदासी, मनहूसियत 

तुम्हारे आसपास भी।


हर वक्त तारी रहती है 

खालिस भोलेपन 

तुम्हारी हंसी में 

ओढ़ लेती हो 

बच्चों की दूधिया हंसी-सी मासूमियत 

मुस्कुरा उठती हैं तुम्हारी आंखें भी 

तुम्हारी निश्छल हंसी से 

फैल जाता है तुम्हारा चेहरा 

उल्लास से 

चिड़ियों के पंख के मानिंद।


खुद नहा जाती हो 

कभी-कभी अपनी हंसी से ही 

एक ताज़गी झलकने लगती है 

नए कोंपल, नए पत्तों-सी

तुम्हारे मुखमंडल पर। 


रुककर निहारते हैं लोग 

क्षणभर तुम्हें

हंसती हो जब तुम 

नदी के उन्मुक्त प्रवाह की तरह। 


खनखनाहट होती है 

तुम्हारे चहकने में भी 

निखर उठता है तुम्हारा लावण्य 

तुम्हारे चेहरे पर 

गुनगुनी धूप सरीखी 

जब तुम मुस्कुराती हो। 


वही चुलबुलापन 

वही चपलता होती है 

हंसती हो जब तुम खिलखिलाकर 

जैसे हरहराती बहती जाती है नदी 

पहाड़ से उतरते हुए। 


चाहे गर्मियों की शाम हो 

सर्दियों की धूप हो 

दरख्तों के साए हों 

अथवा बरसात की रिमझिम फुहार हो 

एक-सी ही होती है तुम्हारी हंसी 

एक अर्थ देते हुए 

चेहरा और चेतना और संवेदना को भी।


जब तुम हंसती हो 

मुस्कुराती हो 

सूरज की किरणों की तरह 

बदलता है तुम्हारी आंखों का रंग भी 

कभी नीले और कत्थई 

कभी स्लेटी 

तो कभी हल्का हरा भी 

या फिर धूप जाने और रात शुरू होने के बीच जो रंग उभरता है न 

बिलकुल वैसा। 


तुम्हारी हंसी में होती है 

आत्मीयता,लयात्मकता, मादकता 

पूरक हैं एक-दूसरे की 

तुम्हारा व्यक्तित्व, और 

तुम्हारी सदाबहार हंसी।

--------------------------------उपहार में मिली रचना 

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