कभी सोचती हूं तो लगता है कि काम क्रोध लोभ मोह यह सब हमारे मन के विकार है ना जाने क्यों लोग इन्हें ही तवज्जो देना शुरू कर देते हैं इस दुनिया में क्या है कुछ भी नहीं सब क्षणभंगुर है इतने राजा महाराजा हुए सब खत्म हो गया कुछ भी नहीं बचा हम आज है हम कल नहीं रहेंगे फिर किसलिए इतना दम
मुस्कुराना
कितना अच्छा लगता है सुबह सुबह सूरज का निकलना पंछियों का चहकना फूलों का खिलना और रोशनी का बिखर जाना रात के अंधेरे को मिटाते हुए जब रोशनी होती है तो मन खुशी से प्रफुल्लित होता है बहुत अच्छा लगता है मुझे दुनिया को रोशनी में देखना मुझे नहीं पसंद अंधेरा नहीं पसंद मुझे मुरझाना नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा मुस्कुराना तुम्हारा मुझ से बतियाना....... सीमा असीम 3, 10, 20
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