मेरी आत्मा में उठता हुआ दर्द तुम तक जरूर पहुँचता होगा तभी तो बहते हैं मेरे आँसू और लगातार बहते जाते हैं,,, यक़ीनन जितना तुमने मुझे रुलाया है उससे कई नदियों भर गयी होंगी या शायद कई समुन्द्र भी क्योंकि यह आँसू बहुत मीठे थे अब खारे लगते हैं... काश तुम समझ जाते कि प्रेम क्या होता है पर तुम कहाँ समझोगे भला? तुम्हें कहाँ होती है कोई परवाह अगर होती तो कभी यूँ शब्दों के तीर न चुभाये होते न कभी यूँ मुझे रोने तड़पने दिया होता...
तुम ऐसे क्यों हो बताओ मुझे क्यों तुम इतने मस्त हो हर्फ़न मौला? कि तुम्हें जरा भी दर्द नहीं होता है... तुम्हें भी हो जाये मोहब्बत सच्ची तो समझ आयेगा सब कुछ अभी तक तो हुई नहीं न अगर होती तो कभी यूँ न करते तुम?
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