अब मैं तुम्हें नहीं पढूंगी कि पढ़ती हूँ ज़ब भी तुम्हें मुझे दुःख होता है बेपनाह दर्द जिसे मैं किसी हाल संभाल नहीं पाती हूँ... दर्द से बेहाल हो मैं न जी पाती हूँ और न कुछ कर पाती हूँ... तुम तो मुझे हमेशा से दुःख देते आये हो, हर बार तुम मुझे ऐसे ही तो रुलाते हो और तड़पाते हो फ़िर भी मैं आ जाती हूँ लौट लौट कर तुम्हारे पास,, जानती हूँ अब तुम्हें अच्छे से कि तुम उचश्रनखल हो,, तुम्हारा कोई दीन ईमान नहीं है तुम खुद की नजरों में भी गिर चुके हो बस जी रहे हो इसलिए ऊँची ऊँची हाँकते हो आखिर तुम ऐसे क्यों हो जरा सी फिसलन पर फिसल जाते हो, ज़ब देखो तब गिरी हरकत पर उतर आते हो, कभी meri भावनाओं की कद्र ही नहीं तुम्हें... हैरत होती है तुम्हारी इंसानियत पर क्या तुम अब इंसान भी नहीं रहे...
क्या तुम्हारे दिल में कोई भाव ही नहीं हैं? बेदिल बेभाव के शख्स,,, तुम जी कैसे पाते हो? मुझे शर्मिंदगी है कि तुम मेरे अपने हो,, ऐसे अपने जिसे मेरी जरा भी परवाह नहीं... लेकिन सुनो मुझ गरीब को सता कर तुम भी खुश नहीं रह पाओगे... क्योंकि एक गरीब की आह सात आसमां के पार जाती है..
किसी को मत सताओ मत दो इतने दुःख दर्द और तकलीफ जिससे मेरे दिल से दुआओं की जगह सिर्फ बद्दुआ ही निकले....
तुम्हारे शब्दों के तीर जो दिल को छलनी करते हैं न वे किसी भी तरह से भरते नहीं हैं याद रखना जो तुम मुझे दे रहे हो वही वापस तुम्हें मिलेगा बस देर है अंधेर नहीं... सब वापस लौटता है..
मैं तुम्हें प्रेम ही दूँगी और फूलों सी महक भी लेकिन तुम्हारे शब्दों के तीर तुम्हें जरूर वापस मिलेंगे याद रखना तुम...
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