इन दिनों
जाने क्यों मन उसकी ओर खिंचा चला जाता है
जिसे ना देखा कभी, ना जाना कभी, ना समझा
और न पहचाना
फिर क्यों वह मेरे मन को बांधे लिए जाता है
जी करता है उसे बार-बार बात करूं
उससे पूछे उसका हाल
उसके बारे में जान लूँ सब कुछ
और बाँट ले आपस में
अपने अपने सुख दुःख
..... और
जैसे सुबह की पहली किरण हो
तो
उसको देखूं
जब चांद ढलती हुई रात आए
तो मैं उसको निहारुँ
हरदम रहूँ आसपास
यह तमन्ना यह ख्वाहिश यह आस
क्यों जगी है आजकल इन दिनों
मेरे तन्हा मन में....
सीमा असीम
3,12,20

वाह!
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