Posts

Showing posts from November, 2020

सच्चे मन से

Image
 उनकी आपस में बात नहीं होती रोज रोज  वे आपस में मिलते भी नहीं है रोज-रोज  ना दूर होते हैं कभी भी  ना पास होते हैं कभी   फिर भी वे बातें करते हैं आपस में हर वक्त फिर भी वे आपस में मिलते हैं हर वक्त  वे दूर होते नहीं है कभी भी  वे पास पास रहते हैं हर वक्त  क्या यकीन नहीं होता है तुम्हें जरा भी  क्या तुम्हें विश्वास नहीं होता है इस बात पर   हां होगा भी भला कैसे  कभी मन को सच्चा किया ही नहीं होगा तुमने  कभी सच्चा प्यार किसी से किया ही नहीं होगा तुमने  कभी किसी के लिए दिल धड़का ही नहीं होगा तुम्हारा  कभी किसी से मिलने की चाहत भी नहीं हुई होगी तुम्हारी  ऐसा होता अगर कभी भी  तो तुम जान जाते  तो तुम समझ जाते  हर बात दिल की  हर बात मन की  कि प्रेम होता है सदा सच्चे मन से है  पवित्र मन से  कभी आजमा लेना  सब समझ जाओगे  दूर रहकर भी किसी से हर वक्त पास पाओगे  यही तो होती है सच्चे प्यार की निशानी  जो तेरा है वह सदा तेरा ही रहेगा  दूर रहे चाहे रहे पास  क...

आगे

तुम्हें भी होता होगा न

 जो दुःख जो कष्ट मेरी आत्मा को होता है  क्या तुम्हें भी होता है  जिस तरह से मेरा जिस्म बेजान हो जाता है  क्या तुम्हारा भी होता है  न सुध होती है खाने की न पीने की होती है  क्या ऐसा ही तुम्हारे साथ भी होता है  ज़ब बेतहाशा बहते हैं मेरे आँसू रुकते ही नहीं किसी तरह  तो क्या तू भी रोता होगा  भूल जाती हूँ सारी दुनिया याद रहते हो सिर्फ तुम ही  क्या तुम भी यूँ ही भूल जाते हो सब  दिन रात रटता है मेरा मन तेरा ही नाम  क्या तू भी करता है ऐसा  पल पल याद करती हूँ मैं तुझे  क्या तू भी याद करता है मुझे  ज़ब कोई आकर कहता है कि उससे मेरा मिलना जुलना  होता रहता है  तो मन विश्वास ही नहीं करता है क्योंकि तू तो मेरा है न  सिर्फ मेरा ही तो कैसे कोई तुझसे मिल सकता है  या फिर तू ही कहाँ किसी से मिलता होगा  मेरे सिवाय तुझे कोई नजर ही कहाँ आता होगा  जैसे मैं तेरे अलावा किसी को देख नहीं पाती हूँ दुनिया में  हैं न?  सीमा असीम  5, 11, 20

मन

 यह मेरा मन कभी कैसा होता है  ना जाने कितनी बातें करता है  खुद से ही कहता है सुनता है  हंसता है कभी रोता है  और कभी डूब जाता है  बहुत गहरे, गहराई में मन की   और फिर उबरना ही नहीं चाहता वहां से  उसे डूबे रहने में ही सुख मिलता है   बाहर आते ही दुखी उदास हताश निराश हो जाता है  ना जाने क्या चाहता है मन  कुछ चाहता है तुमसे  अनोखा सा पर   तुम मिल तो सकते हो   लेकिन थोड़ी देर के लिए  कुछ समय के लिए  और फिर बिछड़ जाते हो   बिना किसी बादे के बिना किसी कसम के रस्म के  ना जाने कब मिलने के लिए  ना जाने कब साथ उठने बैठने खाने पीने के लिए  सोचता ही नहीं है मन  समझता ही नहीं है मन  बेकाबू सा बेचैन सा  भागा चला जाता है  खिंचा चला जाता है  उसकी तरफ़ उस ओर   जिधर कोई परवाह ही नहीं  कोई फिक्र ही नहीं  कोई इंतजार ही नहीं  या खामोशियों में लिपटे  गरम एहसासों की तरह  लपेट लेता है मन को मेरे  कभी ना दूर जाने देने के लिए...