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Showing posts from July, 2019
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 चाहा है तुमको सनम सिर्फ तुमको ही चाहेंगे इन ज़िंदगी की राहों में तन्हां  बसर हुई। ..  सुनो           सच    तो यही है न कि अपनी जान की कभी परवाह ही नहीं की  मैनें सिर्फ सिर्फ तुम और  सिर्फ तुम  ही रहे  मेरे जीवन में लेकिन  बड़ा  दुःख और दर्द होता है कि मैं सबकुछ जान कर  समझ  भी मासूम ही बनी रही  और तुम्हें पहले सी शिद्दत से ही चाहती रही ,,,अपनी आँखें ,कान ,नाक सब बंद कर ली कि न कुछ देख सकूँ न सुन सकूँ और न ही खुशबु ले सकूँ ,,,, इतना सच्चा  होने पर भी  तुम्हें कोई फर्क नहीं कमाल है कहते हैं न इंसान की आदतें कभी नहीं बदलती , खैर  मुझे  क्या , मेरे कर्म  मेरे साथ और तुम्हारे कर्म तुम्हारे साथ , हमेशा ख़ुशी दी है और देती भी रहूंगी हमेशा दुआ दी है और देती भी रहूंगी ,हमेशा अपने शब्दों में दिल में जीवन में शामिल रखा और रखूंगी भी , प्रिय शायद कभी कभी तुम्हें भी मेरे दुःख या दर्द का अहसास होता होगा। . क्या पता ,,,,,एक गहरी साँस। ..यह कैसी दू िया है यह कैसा प्रेम ...
 न कोई गिला है तुमसे न कोई खता है तुम्हारी कुछ गलत है तो सिर्फ इतना मैनें वफ़ा की तुमसे ईमानदारी और सच्ची के साथ हाँ प्रिय सुनो , तुम्हारी कोई गलती नहीं है अगर कुछ भी गलती है तो यही कि मैनें तुम्हें सच्चे दिल से चाहा और पूरी ईमानदारी से रिश्ता निभाया , सिर्फ तुम्हारी ही होकर रह गयी और पूरी दुनिया को भुला दिया , सोचा तक नहीं किसी और के बारे में न ही कभी ख्याल ही गया बस दुःख  कभी कभी कि जो वफ़ा जो ईमानदारी मैनें रिश्ते में निभाई वो तुम कायम क्यों नहीं रख सके ,क्यों डगमगा गए तुम ? क्यों भटके ? किस चाह में ? ऐसी कौन सी ख्वाहिश थी सनम जो मैनें पूरी नहीं की ,या मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी खैर क्या कहूं मैं तुम्हें। ..क्योंकि तुम्हें कुछ कहना खुद को ही ऊँगली दिखाना है ,मैं बस  कहना चाहती हूँ आज खुद से ही कि तुम मेरे हो सिर्फ मेरे क्योंकि यही सच है अब और यही मेरा विश्वास भी है , ! अगर मैं पूरी तरह से ईमानदार हूँ औरा अपने मन का विश्वास पक्का बनाये रखती हूँ तो फिर दुनिया की कोई भी ताकत हमें एक दूसरे से जुदा  नहीं कर पाएगी और न ही तुम कभी मेरे विश्वास को धोखा दे पाओगे। ..स...
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 आज  इस कदर याद आई तुम्हारी कि अश्क आँखों से बहते ही रहे ! सुनो प्रिय ,           आज न जाने क्यों बारिश की तरह मेरी  आँखें  बरसती  रही हालाँकि हर तरफ तेज धूप थी मानों यूँ आग सी चारो तरफ घिरी  हुई थी और मैं उसके बीच में  विरह जलन  से जल जल कर ख़ाक होती हुई फिर  जली और न ही और  ही कुछ बची, बस यह समझ लो जैसे बिन पानी की तड़पती हुई मछली की तरह मैं नैनो से गिरते हुए नीर के सागर में डुबकियां लगाकर आग के  गोले में डूब गयी ,,,,  मेरे सनम न तो ममुझे अब उबरने की   खबर है और न ही गहराई में उतर जाने की कि सुध बुध सब गवा दी है मैंने ,सच में नहीं जानती मैं कि तुम मेरे साथ कैसा व्यव्हार कर रहे हो या कैसे अपनी प्रीत निभा रह हो कितने सच हो या कितने झूठ यह भी जानने  की   ख्वाहिश नहीं है बस इतना जानती हूँ  मैं अगर तुम मेरे साथ जरा सा भी गलत करोगे ईश्वर तुम्हारे साथ दसगुना गलत करेगा , तुम्हारे लिए मेरे मन में हमेशा ही बहुत प्रेम था और रहेगा लेकिन तुम्हारी गलतियों पर गलतियां द...