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नवबर्ष

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 आज नव वर्ष के पहले दिन से यात्रा पर आधारित नया ब्लॉग शुरू करती हूं, घूमना किसे पसंद नहीं होता, सब को घूमना मस्ती करना इंजॉय करना कुछ पल अपने साथ बिताना दुनिया की परेशानियों से दूर चले जाना सभी को अच्छा लगता है ना लेकिन अगर  कुछ तैयारियों के साथ किया जाए तो मजा दोगुना हो जाता है न...
 बेटे किताबें पत्री पतरा छोड़ चला खेती किसानी में मन लगा कुछ ना होगा तेरे पढ़ने लिखने से मैं भी पढ़ा था पांच जमात कुछ कर पाया मैं खेती किसानी से ही पेट भरा है हमें घर पाला है एक रस्सी चलाई है तेरी मां को जेवर भी बनवा कर दी है मैंने इस किसान खेती किसानी से और देख अगर तू पड़ेगा लिखेगा तो कुछ ना कर पाएगा मैं आज तुझसे फिर बार कह रहा हूं एक बार और सुन ले देख पास पड़ोसी सब कह रहे हैं कि तू बहुत पढ़ाने में लगाया अपने बच्चे को बिगड़ जाएगा शहर चला गया तो कभी वापस भी कल रामधन का का भी मौज है समझा रहे थे कि मत पढ़ा लड़का को ज्यादा अगर पड़ गए हो तो दिमाग खराब हो जाए गोगा को शहर चलोगे तो शहर में लोहड़ी उनके पीछे भागो भागो तेरा हीरो और उल्टा सीधा कर बैठो तो तू तो अपने लोढ़ा से भी जाएगा तो बेटा मैं तुझे समझा रहा हूं कि 5 बच्चा है हमारे दिल में तू अकेला लड़का है जाल ओड़िया है उनकी तो ब्याह में गोली चली जाएंगे अपने घर तुझे 5 बीघा खेती कौन देखेगा  आज फिर पिताजी वही सब बातें तोहरा रहे थे जो कल भी उससे कही थी अब क्या करें उसे समझ ही नहीं आ रहा कि अब क्या करें कैसे पढ़े माने तो अपनी जान गिरवी रखकर...

कहानी

दर्द इतना ज्यादा आंखों के आंसू रो कि नहीं रहे जितना रोकने की कोशिश करो उतना ही ज्यादा प्यार है मनु है ऐसा लगता जैसे कि कोई कलेजा खींच के लिए चला जा रहा है मैं आपको कितनी चोट पर चाहिए सीने पर जोर जोर से मारा सर के बाल पूरी तरह से खींच ली है परेशान क्यों कर के अपना गला दबा दें करके कोशिश की जवानी के लेकिन सुबह जा रहे थे जा रहे हो आज का नहीं है कई सालों से लगाता है चलना है क्यों जैसे सच्चे दिल से अपना समझती वही उसे दगाबाजी कर रहा था झूठ बोलनालना सफाई देना उसका शक्ल बन गया था की नजरों में किसी औरत की कोई इज्जत ही नहीं जिसको भी तो उससे उससे ही बात करता हूं अपने शब्दों से उसका हंगामा कर देता हैरत होती थी ठीक है सा कैसे होता है कोई आदमी जो दिल से हमको छोड़ना तन मन धन से बर्बाद करके औरत का मस्त गाना मस्त ईमान धिक्कार है धिक्कार है लानत इसे कहते हैं न जाने क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता उस शख्स को कोई भी फर्क नहीं पड़ता पहले से ज्यादा और बहरा हो गया

सुंदर कविता

 *सुंदर कविता* जो कह दिया वह *शब्द* थे ;       जो नहीं कह सके               वो *अनुभूति* थी ।। और,       जो कहना है मगर ;            कह नहीं सकते,                    वो *मर्यादा* है ।। *बात पर गौर करना*- ---- *पत्तों* सी होती है          कई *रिश्तों की उम्र*,  आज *हरे*-------! कल *सूखे* -------! क्यों न हम,  *जड़ों* से;  रिश्ते निभाना सीखें ।। रिश्तों को निभाने के लिए,  कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*,     और कभी *बहरा* ;             होना ही पड़ता है ।। *बरसात* गिरी    और *कानों* में इतना कह गई कि---------! *गर्मी* हमेशा          किसी की भी नहीं रहती ।। *नसीहत*,               *नर्म लहजे* में ही                 अच्छी लगती है । क्योंकि,...

इन दिनों

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 जाने क्यों मन उसकी ओर खिंचा चला जाता है जिसे ना देखा कभी, ना जाना कभी, ना समझा और न  पहचाना फिर क्यों वह मेरे मन को बांधे लिए जाता है जी करता है उसे बार-बार बात करूं  उससे पूछे उसका हाल उसके बारे में जान लूँ सब कुछ और बाँट ले आपस में अपने अपने सुख दुःख ..... और  जैसे सुबह की पहली किरण हो  तो उसको देखूं जब चांद ढलती हुई रात आए तो मैं उसको निहारुँ हरदम रहूँ आसपास यह तमन्ना यह ख्वाहिश यह आस क्यों जगी है आजकल इन दिनों मेरे तन्हा मन में.... सीमा असीम 3,12,20