मूरख
तुम क्या जानों प्रेम अगर जानते तो कभी भी मुझे मूरख न कहते तुम अपनी बुद्धिमत्ता से आंकते रहे मुझे और मैं बनी रही मूरख लेकिन यकीं जानों मैंने प्रेम के उस चरम को पाया है जो तुम कभी महसूस ही नहीं कर सकते अब न बची कोई चाह न कोई इच्छा न कोई अभिलाषा कि मैंने जिया है सच्चे प्रेम को तुम्हें पाकर ........... सीमा असीम ३०.३,२४